शुक्रवार, 15 मार्च 2019

संस्कृते सूक्तयः


अर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धुःधन ही इस संसार में मनुष्य का बन्धु है। 
दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययालङ्कृतोऽपि सन् = दुर्जन व्यक्ति की सदैव उपेक्षा करनी चाहिए, भले ही वह विद्या से अलङ्कृत हो।
दूरतः पर्वताः रम्याः - दूर की वस्तु अच्छी लगती है।

धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः- धर्महीन (मनुष्य) पशु के समान है।
नास्ति कामसमो व्याधिः - वासना के समान कोई रोग नहीं ।
नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशति मुखे मृगाः - आलसी व्यक्ति को स्वतः सफलता नहीं मिलती ।
प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति - श्रेष्ठ लोग कार्य प्रारम्भ करके पूर्ण किए बिना नहीं छोडते ।
महाजनो येन गतः स पन्थाः- श्रेष्ठ लोग जिधर से जाएं वही मार्ग है।
परोपकाराय सतां विभूतयः- सज्जनों की सम्पत्ति भलाई के लिए होती है।
योगः कर्मसु कौशलम्- कर्मों में कुशलता ही योग है।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्तेरमन्ते तत्र देवताः -जहाँ नारियों की पूजा होती हैवहाँ देवता निवास करते हैं।
वीरभोग्या वसुन्धरा- पृथ्वी वीरों के द्वारा भोगी जाती है।
श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् - श्रद्धावान व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है।
लोभः पापस्य कारणम् - लोभ पाप का कारण है।
सत्यमेव जयते नानृतम्- सत्य की ही जीत होती हेअसत्य की नहीं।


यहाँ  क्रमशः अन्य सूक्तियाँ संयोजित की जाती रहेगी।

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