उपनयन संस्कार

भारतीय मनीषियों ने जीवन की समग्र रचना के लिए आश्रम व्यवस्था की स्थापना की। इसका मूल उद्येश्य मनुष्य को सहज ही पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति कराना था। ब्रह्मचर्य काल में धर्म का अर्जन एवं गृहस्थ जीवन में अर्थ-काम का उपभोग गीता के शब्दों में 'धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ'' धर्म-नियंत्रित अर्थ और काम तभी संभव था जब प्रारंभ में ही धर्म-तत्वों से मनुष्य दीक्षित हो जाय। इसके बाद जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करने के लिए भी यौवन काल में अभ्यस्त धर्म ही सहायक होता है। इस प्रकार पुरुषार्थ चतुष्टय और आश्रम चतुष्टय में अन्योन्याश्रय प्रतीत होता है या दोनों आधाराधेय भाव से जुड़े हैं।
उपनयन संस्कार का काल निर्धारण
पारस्कर गृह्यसूत्र के अनुसार ब्राह्मण बालक का उपनयन संस्कार आठ वर्ष के पूर्व, क्षत्रिय का ग्यारह वर्ष के पूर्व, और वैश्य का बारह वर्ष के पूर्व की अवस्था में किया जाता था।
आषोडशाद्वर्षाद् ब्राह्मणस्यानतीतः कालो भवति ।। पा-गृ२/५/३६।।
आद्वाविंशाद् राजन्यस्य।।पा-गृ२/५/३७।।
आचतुर्विंशाद् वैश्यस्य।।पा-गृ२/५/३८।।
तीव्र बुद्धि पाने की इच्छा से ब्राह्मण का पाँच, बलवान क्षत्रिय का छः और कृषि आदि करने की इच्छा वाले वैश्य का आठ वर्ष की अवस्था में यह संस्कार करने का विधान है।
           ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं  विप्रस्य  पञ्चमे
            राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे। -मनुस्मृति 2 अ. 37
अधिकतम निर्धारित आयु तक जिन उच्च वर्ण के बालकों का उपनयन नहीं  जाता था शिष्ट समाज में उनको निंदनीय समझा जाता था। ।
ब्राह्मण बालक के उपनयन संस्कार की अंतिम अवधि सोलह वर्ष तक, क्षत्रिय कुमार की अंतिम अवधि बाइस वर्ष और वैश्य कुमार के उपनयन की अन्तिम अवधि चौबीस वर्ष की है ।
आषोडशाद्वर्षाद् ब्राह्मणस्यानतीतः कालो भवति ।। पा-गृ२/५/३६।।
आद्वाविंशाद् राजन्यस्य।।पा-गृ२/५/३७।।
आचतुर्विंशाद् वैश्यस्य।।पा-गृ२/५/३८।।
मनु ने मनुस्मृति में पारस्करादि गृह्यसूत्रों के सिद्धान्तों  को इस प्रकार उल्लेख किया है-
आषोडशाद् ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते ।
आद्वाविंशेः क्षत्रबन्धोः आचतुर्विंशतेर्विशः ।।मनु२।।
गृह्यसूत्रों के मत से ऊपर कही गयी अवधि के बाद वे पतितसावित्री वाले हो जातें है ।
            अत ऊर्ध्वं पतितसावित्रीका भवन्ति ।।पा-गृ२/५/३९।।
नैनानुपनयेयुर्नाध्यापयेयुर्न याजयेयुर्न चैभिर्व्यवहरेयुः ।।पा-गृ२/५/४०।।
कोई आचार्य व्रात्य प्रायश्चित् के बिना इन पतित सावित्री वालें कुमारों का उपनयन-संस्कार न कराए। इन्हें वेदादि न पढाए, इनसे यज्ञादि न कराए और इन लोगों के साथ किसी तरह का व्यवहार न करे ।
सत्रहवीं शताब्दी के निबन्धकारों ने परिस्थितियों के अनुरूप ब्राह्मण का 24 क्षत्रिय का 33 और वैश्य का 36 तक भी उपनयन स्वीकार कर लेते हैं। - बी.मि.भा. 1 (347)
नक्षत्र विचार :- क्षिप्र संज्ञक नक्षत्र (हस्त, अश्विनी, पुष्य), ध्रुव संज्ञक (तीनों उत्तरा और रोहिणी), आश्लेषा, चर संज्ञक (स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष), मूल, मृदुसंज्ञक (मृगशिरा, रेवती, चित्रा), तीनों पूर्वा, आर्द्रा नक्षत्रों में, रवि, बुध, गुरु, शुक्र और सोम वासरों में, , , , ११, १२, १० तिथियों में, शुक्ल पक्ष में तथा कृष्ण पक्ष के प्रथम विभाग में (प्रतिपदा से पंचमी तक), व्रतबन्ध शुभ होता है। अपराह्न (दोपहर बाद ) मे उपनयन संस्कार नहीं करना चाहिए ।
सूर्य के दक्षिणायन होने पर (कर्क संक्रान्ति से धनु संक्रान्ति के अन्त तक ) व्रतबन्ध, देवप्रतिष्ठा, जलाशयप्रतिष्ठा, विवाह, अग्निहोत्र धारण, गृहप्रवेश, मुण्डन, राज्याभिषेक आदि कर्म शुभकारक नहीं होते । अतः सूर्य के दक्षिणायन में इन शुभ कार्यों का सम्पादन नहीं करना चाहिए ।
बाल्यावस्था, अस्तंगत एवं वृद्धावस्था का गुरु और शुक्र भी शुभफलदायक नहीं होता। अतः उपरोक्त संस्कारों में गुरु और शुक्र की शुभकारी स्थिति ही स्वीकारणीय है। उपनयन के लिए अपने पुरोहित से ग्रहों की अवस्था का विचार कराकर ही तिथि निर्धारित करें।

ग्रहों के शुभाशुभ भाव विचार:- व्रतबन्ध में लग्न से छठें, आठवें, भाव में शुक्र, गुरु, चन्द्रमा और लग्नेश अशुभ होते हैं। चंद्र और शुक्र बारहवें भाव में अशुभ होते हैं । साथ ही अशुभ ग्रह लग्न, अष्टम एवं पंचम भावों में अशुभ होते हैं ।
लग्नशुद्धि :- व्रतबन्ध काल में लग्न से ८, , १२ भावों को छोड़कर शेष भावों में शुभग्रह, , , ११ भावों में पाप ग्रह तथा लग्नस्थ पूर्ण चन्द्रमा वृष अथवा कर्क राशि में स्थित हो तब शुभ होता है।
वर्णानुसार ग्रह विचार :- जातक का वर्ण जान कर उनसे सम्बंधित ग्रह-स्वामी साथ ही वेद का भी विचार अवश्य करना चाहिए। ब्राह्मण वर्ण के स्वामी गुरु और शुक्र, क्षत्रियों के स्वामी सूर्य और भौम, वैश्यों के चन्द्रमा, शूद्रों के बुध और अंत्यजों (चण्डालिकों) के शनि हैं।
ऋग्वेद के स्वामी गुरु, यजुर्वेद के शुक्र, सामवेद के भौम और अथर्ववेद के स्वामी बुध होते हैं।
वेद शाखाओं के स्वामी ग्रहों के वार तथा लग्न के बलवान रहने पर व्रतबन्ध उत्तम होता है। वेदशाखा का स्वामी ग्रह, सूर्य, चंद्र और गुरु बलवान हो तो व्रतबन्ध शुभकारक होता है।
यदि गुरु या शुक्र शत्रुग्रह की राशि में हो, किसी ग्रह से पराजित हो अथवा अपनी नीच राशि में होकर स्थित हो तब ऐसी स्थिति में ब्रतबन्ध शुभफल प्रदाता नहीं हो सकता, बटुक वेद-शास्त्र की विधियों से अनभिज्ञ होता है। अतः आचार्य को ऐसे मुहूर्त में व्रतबन्ध को सम्पादित नहीं करना चाहिए। अशुभ मुहूर्त में संस्कार संपादित कराने वाला आचार्य दोष का भागी होता है।

वर्तमान युग में उपनयन संस्कार प्रतीकात्मक रूप धारण करता जा रहा है। विरल परिवारों में यथाकाल विधि-व्यवस्था के अनुरूप उपनयन संस्कार हो पाते हैं। एक ही दिन कुछ घण्टों में चूड़ाकरण, कर्णवेध, उपनयन, वेदारंभ और केशान्त कर्म के साथ समावर्तन संस्कार की खानापूरी कर दी जाती है। बहुसंख्य परिवारों में विवाह से पूर्व उपनयन संस्कार कराकर वैवाहिक संस्कार करा दिया जाता है। यह अनुचित है।
यौवन के पदार्पण करने के पूर्व किशोरावस्था में संस्कारित और दीक्षित करने का अनुष्ठान सार्वकालिक और विश्वजनीन है। सभी सम्प्रदायों में किसी न किसी रूप में दीक्षा की पद्धति चलती है और उसके लिए विशेष प्रकार के विधि विधानों के कर्मकाण्ड आयोजित किये जाते हैं। उपनयम संस्कार के बाद वेदारम्भ करने का विधान किया गया है। इन विधि-विधानों के माध्यम से संस्कारित व्यक्ति ही समाज में श्रेष्ठ नागरिक की स्थिति प्राप्त कर सकता है। इसी उद्देश्य से उपनयन संस्कार की परम्परा भारतीय मनीषा में स्थापित की थी।
'संस्कार का उद्देश्य' –
वास्तव में उपनयन संस्कार आचार्य के समीप दीक्षा के लिए अभिभावक द्वारा पहुंचना ही इस संस्कार का उद्देश्य था। इसी लिए इसके कर्मकाण्ड में कौपीन; मौद्जी, मृगचर्म और दण्ड धारण करने का मंत्रों के साथ संयोजन है। उपनयन संस्कार का पूरा विवरण गृह्यसूत्रों और स्मृतियों में मिलता है। इस समय बालक एक मेखला धारण करता है, जो तीनों वर्णों के लिए अलग- अलग निर्धारित की गई है। ब्राह्मण बालक मूंज की, क्षत्रिय धनुष की डोरी की और वैश्य ऊन के धागे की मेखला धारण करता है। उनके डंडे भी अलग- अलग लकड़ियों के होते हैं। ब्राह्मण ढाक या बेल का, क्षत्रिय बरगद का और वैश्य उदुंबर का दंड धारण करता है । वह यज्ञोपवीत भी धारण करता है। आचार्य इसके बाद बालक से पूछता है कि क्या वह वास्तव में अध्ययन करने का इच्छुक है और ब्रह्मचर्य पालन की प्रतिज्ञा करता है। बालक के इन दोनों बातों का पूर्ण आश्वासन देने पर ही आचार्य उसे अपना शिष्य बनाते हैं। आचार्य कहता है कि तू आज से मेरे कहने के ही अनुसार कार्य करेगा। इसके बाद आचार्य गायत्री मंत्र का अर्थ शिष्य को समझाते हैं।
इस संस्कार के बाद बालक "द्विज' कहलाता है, क्योंकि इस संस्कार को बालक का दूसरा जन्म समझा जाता है। ( जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते ),अर्थात् वह वेदाध्ययन का अधिकारी हो जाता है। उपनयन का शाब्दिक अर्थ होता है "नैकट्य प्रदान करना', क्योंकि इसके द्वारा वेदाध्ययन का इच्छुक व्यक्ति वेद- शास्रों में पारंगत गुरु/ आचार्य की शरण में जाकर एक विशेष अनुष्ठान के माध्यम से वेदाध्ययन की दीक्षा प्राप्त करता है। वेदाध्ययन के इच्छुक विद्यार्थी को गुरु अपने संरक्षण में लेकर एक विशिष्ट अनुष्ठान के द्वारा उसके शारीरिक एवं जन्म- जन्मांतर दोषों/ कुसंस्कारों का परिमार्जन कर उसमें वेदाध्ययन के लिए आवश्यक गुणों का आधान करता है, उसे एतदर्थ आवश्यक नियमों ( व्रतों ) की शिक्षा प्रदान करता है, इसलिए इस संस्कार को "व्रतबन्ध' भी कहा जाता है।
आचार्यो दशसाहस्रं गायत्रीं प्रजपेत्तहै  के आदेश से उपनयन के पहले आचार्य को पहले ससंकल्प १०००० गायत्री जप करके ही गायत्री-उपदेश के आचार्यत्वाधिकार प्राप्त करना होता हैं। वस्त्रमवगुण्ठ्य उपदेशं माणवकाय दद्यात् की आज्ञा से कोई सुन न सके इस तरह वेदिका के उत्तरी भाग में वस्त्र में आचार्य और माणवक रहकर माणवक को सरहस्य (ऋषि छंद देवता के साथ) गायत्री प्रदान करते हैं। इसके बाद बालक भिक्षा माँगता है, जिससे कि उसमें अहम्यन्यता न रहे। भिक्षा में प्राप्त भोजन वह गुरु को देता है और गुरु के भोजन कर लेने के बाद उसमें से जो भोजन शेष बचता है, उसे वह स्वयं खाता है।
 सावित्री मंत्रधारी द्विज अपने ब्रह्मचारी वेष में अपनी माता से पहली भिक्षा और फिर समाज के सभी वर्ग से भिक्षाटन करने का अभ्यास इस संस्कार का वैशिष्ट्‌य है। इस व्यवस्था से ब्रह्मचारी को व्यष्टि से समष्टि और परिवार से बृहत्‌ समाज से जोड़ा जाता था, जिससे व्यक्ति अपनी सत्ता को समष्टि में समाहित करें और अपनी विद्या बुद्धि शक्ति का प्रयोग समाज की सेवा के लिए करें।
यज्ञोपवीत संस्कार नाम से कोई संस्कार नहीं होता। गृह्यसूत्रों में उपनयन संस्कार के साथ अथवा अन्य किसी स्वतंत्र संस्कार के रुप में यज्ञोपवीत संस्कार अथवा उपवीत सूत्र धारण करने का कहीं कोई उल्लेख या विवरण प्राप्त नहीं होता है। वस्तुतः इसके नाम, यज्ञोपवीत, से ही व्यक्त है कि इसका सम्बन्ध यज्ञ में यजमान के द्वारा धारण किये जाने वाले उत्तरीय से है, जो कि गोभिल के अनुसार सूत्र, वस्र या कुशरज्जु कुछ भी हो सकता है। कुश के यज्ञोपवीत (यज्ञोत्तरीय) के सम्बंध में देवल का कहना है कि इसे वस्र के अभाव में धारण किया जा सकता है। आप० घ० सू० (2/2/4/22-23 ) का भी कहना है कि यज्ञ कार्य उत्तरीय के साथ किया जाना चाहिए। उसके अभाव में केवल सूत्र से भी काम चलाया जा सकता है।
 किन्तु आधुनिक युग तक आते-आते उपनयन संस्कार का रुप इतना बदल गया कि जनेऊ धारण करना ही उपनयन हो गया। इससे सम्बद्ध वैदिक अनुष्ठान बिल्कुल पीछे छूट गये और यह एक परम्परा का अनुपालन मात्र बन कर रह गया। उपनयन में यज्ञोपवीत के सूत्र धारण करने से ब्रतबंध का आरम्भ हो जाता हैं, जिससे ब्रह्मचारी की पहचान और उसको धारण करने वाले को अपनी दीक्षा संकल्प का सदा स्मरण रहे। सूत्र धारण कराकर उत्तरीय रखने की अनिवार्यता बताई गई है।
विधि विधान-
उपनयन संस्कार से संबंधित प्रान्तीय और विभिन्न सम्प्रदायों के स्तर पर उपनयन पद्धतियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं तदनुसार उनका आश्रय लेकर संस्कारों का संयोजन सम्पादन करना चाहिए।
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विद्यारंभ या अक्षरारंभ


इस महत्त्वपूर्ण संस्कार के संबंध में गृह्य सूत्रों में काफी स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता  और न ही किसी विशेष विधि-विधान की चर्चा ही मिलती है। किन्तु अनेक आकर ग्रंथों, प्राचीन काव्य नाटकों में इसका स्पष्ट उल्लेख आता है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र रघुवंश, उत्तररामचरित आदि में इसकी चर्चा है इससे स्पष्ट है कि उपनयन और वेदारंभ

के पूर्व अक्षरों का सम्यक्‌ ज्ञान अपेक्षित था और अक्षर ज्ञान के समय कुलाचार के अनुसार विधि-विधान किये जाते थे।

विधि-परवर्ती संग्रह ग्रंथों में इसकी विधि व्यवस्था प्राप्त है।

उत्तरायण सूर्य होने पर ही शुभ मुहूर्त में गणेश-सरस्वती-गृह देवता का अर्चन करके गुरु के द्वारा अक्षरारंभ कराया जाय।

द्वितीय जन्मतः पूर्वामारभेदक्षरान्‌ सुधीः।

-बी.मि. (बृहस्पति)

''पश्चमे सप्तमेवाद्वे''-संस्कारप्रकाश-भीमसेन

तण्डुल प्रसारित पट्टिका पर-

श्री गणेशाय नमः, श्री सरस्वत्यै नमः, गृह देवताभ्योनमः श्री लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः लिखकर उसका पूजन कराया जाय और गुरु पूजन किया जाय और गुरु स्वयं बालक का दाहिना हाथ पकड़कर पट्टिका पर अक्षरारंभ करा दे। गुरु को दक्षिणा दान किया जाय।
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कर्ण वेध

आभूषण पहनने के लिए विभिन्न अंगों के छेदन की प्रथा संपूर्ण संसार की असभ्य तथा अर्द्धसभ्य जातियों में प्रचलित है। अतः इसका उद्‌भव अति प्राचीन काल में ही हुआ होगा। - हिन्दू संस्कार पू. 129
आभूषण धारण और वैज्ञानिक रूप से कर्ण छेदन का महत्त्व होने के कारण इस प्रक्रिया को संस्कार रूप में स्वीकारा गया होगा। कात्यायन सूत्रों में ही इसका सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है। सुश्रुत ने इसके वैज्ञानिक पक्ष में कहा है कि कर्ण छेद करने से अण्डकोष वृद्धि, अन्त्र वृद्धि आदि का निरोध होता है अतः जीवन के आरंभ में ही इस क्रिया को वैद्य द्वारा सम्पादित किया जाना चाहिए।
      शङ्‌खो परि च कर्णान्ते त्यक्त्वा यत्नेन सेवनीयम्‌
      व्यत्यासाद्वा शिरां विध्येद्‌ अन्त्राबृद्धि निवृत्तये-सुश्रुत चि. स्थान
भिषग्‌ वामहस्तेन-विध्येत्‌-सुश्रुत संहिता में षष्ठ अथवा सप्तम मास में शुक्ल पक्ष में शुभ दिन में वैद्य द्वारा माता की गोद में मधुर खाते बालक का अत्यन्त निपुणता से कर्ण वेध करना चाहिए। जब कि वृहस्पति जन्म से 10-12-16वें दिन करने को कहते हैं।
विधि विधान-वर्तमान बालिकाओं का कर्णवेध तो आभूषण धारण के लिए अनिवार्यतः होता है किन्तु पुरुष वर्ग के वेध का प्रतीकात्मक ही संस्कार हो पाताहै।
गणेशार्चन, हवन आदि करके निम्न मंत्रों से क्रमशः दक्षिण-वाम कर्णों की वेध की प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है -  भद्रं कर्णेभिः.............आदि मंत्रों से सम्पन्न किया जाय।
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चूड़ाकरण (मुण्डन) संस्कार


मुण्डन संस्कार के संदर्भ में वैदिक ऋचाओं, गृह्यसूत्रों एवं स्मृतियों में मंत्र, विधि प्रयोग, समय निर्धारण के सम्बन्ध में व्यापक चर्चा मिलती है। पद्धतियों में इसका समावेश किया गया है। तदपि लोकाचार कुलाचार से अनेक भेद दिखाई्र देते हैं। अनेक कुलों में मनौती के आधार पर मुण्डन किये जाते हैं किन्तु मुहूर्त निर्णय के लिए सभी ज्योतिष का आधार प्रायः स्वीकार करते हैं। मुण्डन में विधि पूर्वक शास्त्रीय आचार केवल उपनयन कराने वाले कुलों में उसी समय किया जाता है जबकि शास्त्रीय विधान दूसरे वर्ष से बताया गया है यथा -
            प्राङ्‌वासवे सप्तमे वा सहोपनयनेन वा। (अश्वलायन)
            तृतीये वर्षे चौलं तु सर्वकामार्थसाधनम्‌।
            सम्बत्सरे तु चौलेन आयुष्यं ब्रह्मवर्चसम्‌। - वी. मि.
            पद्द्रचमे पशुकामस्य युग्मे वर्षे तु गर्हितम्‌
         निषिद्ध काल-गर्भिण्यां मातरि शिशोः क्षौर कर्म न कारयेत्‌-
इसके अतिरिक्त भी मुहूर्त निर्णय के समय-निषिद्ध काल को त्यागना चाहिए।

शिखा की व्यवस्था

मुण्डन संस्कार के कौल और शास्त्रीय आचार तो किये जाते हैं किन्तु शिखा रखने की प्रथा का प्रायः उच्चाटन होता जा रहा है। जबकि शिखा का वैज्ञानिक महत्त्व है और शास्त्राों में शिखाहीन होना गंभीर प्रायश्चित्त कोटि में आता है ङ्क
               शिखा छिन्दन्ति ये मोहात्‌ द्वेषादज्ञानतोऽपि वा।
               तप्तकृच्च्रेण शुध्यन्ति त्रायो वर्णा द्विजातयः-     लघुहारित

चूड़ाकरण का शास्त्रीय आधार था दीर्घायुष्य की प्राप्ति। सुश्रुत ने (जो विश्व के प्रथम शीर्षशल्य चिकित्सक थे) इस सम्बन्ध में बताया है कि -
(11) मस्तक के भीतर ऊपर की ओर शिरा तथा सन्धि का सन्निपात है वहीं रोमावर्त में अधिपति है। यहां पर तीव्र प्रहार होने पर तत्काल मृत्यु संभावित है। शिखा रखने से इस कोमलांग की रक्षा होती है।
         -मस्तकाभ्यन्तरोपरिष्टात्‌       शिरासम्बन्धिसन्निपातो
            रोमावर्त्तोऽधिपतिस्तत्राापि सद्यो मरणम्‌-  सुश्रुत श. स्थान
विधि-विधान-गणेशार्चन अग्निस्थापन-पद्द्रचवारूणीहवन-नन्दी के बाद पिता केशों का संस्कार यथाविधि करके स्वयं मंत्रा पाठ करता हुआ केश कर्त्तन करता है और उनका गोमयपिन्ड में उत्सर्ग करता है पुनः दही उष्णोदक शीतोदक से केशों को भिगोता और छुरे को अभिमन्त्रिात करके नापित को वपन (मुण्डन) का आदेश देता है।
क्क यत्‌ क्षुरेण मज्जयता सुपेशसावप्त्वा वापयति केशाद्द्रिछन्धिशिरो माऽस्यायुः प्रमोषी॥1
क्क अक्षण्वं परिवप2
येना वपत्‌ सविता क्षुरेण सोमस्य राज्ञो वरुणस्य विद्वान्‌। तेन ब्रह्मणो वपतेदमस्यायुष्यं जरदष्टिर्यथासत्‌॥3
येन भूरिश्चरा दिवंज्योक्‌ च पश्चाद्धि सूर्यम्‌। तेन ते वपामि ब्रह्मणा जीवातवे जीवनाय सुलोक्याय स्वस्तये॥4
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अन्नप्राशन संस्कार



विधिपूर्वक बालक को प्रथम भोजन कराने की प्रथा अत्यन्त प्राचीन है। वेदों और उपनिषदों में भी एतत्‌ सम्बन्धी मंत्र उपलब्ध होते हैं। माता के दूध से पोषित होने वाले बालक को प्रथम बार अन्नप्राशन कराने का प्रचलन प्रायः प्राचीन काल से ही है जो एक विशेष उत्सव के रूप में सम्पन्न किया जाता है।
            जन्मतो मासि षष्ठे स्यात सौरेणोत्तममन्नदम्‌
            तदभावेऽष्टमे  मासे  नवमे दशमेऽपि वा।
            द्वादशे वापि  कुर्वीत  प्रथमान्नाशनं परम्‌
            संवत्सरे वा सम्पूर्णे केचिदिच्छन्ति पण्डिताः॥ - नारद, वी.मि.
            षण्मासं चैनमन्नं  प्राशयेल्लघु हितञ्च - सुश्रुत (शं. स्थान)
छठवें महीने बालक को लघु और हितकर अन्न खिलायें। धर्मशास्त्रों तथा चिकित्सा ग्रन्थों में अन्न प्राशन का विधान छठे मास में किया गया है, परन्तु जब तक बालक के दांत नहीं निकल जायें या पूर्ण रूप से दन्त न निकल पाएँ तब तक अन्न का प्राशन न किया जाय अथवा बहुत थोड़ा किया जाय शीघ्र अन्न देने से-शिशु का उदर बढ़ जाता है और अनेक रोग होने की सम्भावना होती हैं। बालक द्वारा एक बार अन्न खान प्रारम्भ करने पर उसे रोकना अथवा थोड़ा खाने के लिये बाध्य करना बहुत ही कठिन है अन्न प्राशन की सामान्य विधि करके जब पूर्ण रूप से दांत निकल आवे तब अन्न खिलाना चाहिए।

विधि-विधान-अन्नप्राशन संस्कार के दिन सर्वप्रथम यज्ञीय भोजन के पदार्थ वैदिक मन्त्रों के उच्चारण के साथ पकाये जायें। भोजन विविध प्रकार के हों तथा सुस्वादु हों। मधु-घृत-पायस से बालक को प्रथम कवल (ग्रास) दिया जाय। पद्धतियों में एतत्‌ संबंधी मंत्रा उपलब्ध हैं। गणेशार्चन करके व्याहृतियों से आहुति देकर एतत्‌ संबंधी ऋचाओं से हवन करके तत्पश्चात्‌ बालक को मंत्रपाठ के साथ अन्नप्राशन कराया जाय पुनः यथा लोकाचार उत्सव सम्पन्न किया जाय।


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निष्क्रमण संस्कार

प्रथम बार शिशु के सूर्य दर्शन कराने के संस्कार को निष्क्रमण कहा गया है।
             ततस्तृतीये  कर्तव्यं  मासि सूर्यस्य दर्शनम्‌।
            चतुर्थे मासि कर्तव्य शिशोश्चन्द्रस्य दर्शनम्‌
अनेक स्मृतिकारों ने चतुर्थ मास स्वीकार किया है। इस संस्कार के बाद बालक को निरन्तर बाहर लाने का क्रम प्रारंभ किया जाता है।
विधि-भलीभांति अलंकृत बालक को माता गोद में लेकर बाहर आये और कुल देवता के समक्ष देवार्चन करे। पिता पुत्र को-   तच्चक्षुर्देव ........आदि मंत्र का जाप करके सूर्य का दर्शन करावे -
       ततस्त्वलंकृता धात्री बालकादाय पूजितम्‌।
       बहिर्निष्कासयेद्‌ गेहात्‌ शङ्‌ख पुण्याहनिः स्वनैः। - विष्णुधर्मोत्तर
आशीर्वाद -         अप्रमत्तं प्रमत्तं  वा दिवारात्रावथापि वा।
                  रक्षन्तु सततं सर्वे देवाः शक्र पुरोगमाः॥
गीत, मंगलाचरण और बालक के मातुल द्वारा भी आशीर्वाद दिलाया जाय।
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नामकरण संस्कार

बाल्यावस्था के संस्कार- नामकरण

  नामकरण एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संस्कार है । जीवन में सम्पूर्ण  व्यवहार का आधार नाम पर ही निर्भर होता है
     नामाखिलस्य व्यवहारहेतुः शुभावहं कर्मसु भाग्यहेतुः ।
     नाम्नैव कीर्तिंं लभते मनुष्यस्ततः प्रशस्तं खलु नामकर्म।-बी.मि.भा. 1

"नाम सम्पूर्ण व्यवहार का कारण है। यह कर्म में शुभ लाता है और यह भाग्य की जड़ है। नाम से ही मनुष्य यश प्राप्त करता है। इसलिए नामकरण संस्कार प्रशंसनीय है।

उपर्युक्त स्मृतिकार बृहस्पति के वचन से प्रमाणित है कि व्यक्ति संज्ञा का जीवन में सर्वोपरि महत्त्व है अतः नामकरण संस्कार हिन्दू जीवन में बड़ा महत्त्व रखता है।
शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख है कि
      तस्माद्‌ पुत्रस्य जातस्य नाम कुर्यात्‌
      पिता नाम करोति एकाक्षरं द्वक्षरं त्रयक्षरम्‌ अपरिमिताक्षरम्‌ वेति-वी.मि.
       द्वक्षरं प्रतिष्ठाकामश्चतुरक्षरं ब्रह्मवर्चसकामः
प्रायः बालकों के नाम सम अक्षरों में रखना चाहिए। महाभाष्यकार ने व्याकरण के महत्व का प्रतिपादन करते हुए नामकरण संस्कार का उल्लेख किया ।
याज्ञिकाः पठन्ति-    ''दशम्युतरकालं जातस्य नाम विदध्यात्‌
                  घोष बदाद्यन्तरन्तस्थमवृद्धं त्रिापुरुषानुकम  नरिप्रतिष्ठितम्‌।
                  तद्धि प्रतिष्ठितमं भवति।
                  द्वक्षरं चतुरक्षरं वा नाम कुर्यात्‌ न तद्धितम्‌ इति।
                 न चान्तरेण व्याकरणकृतस्तद्धिता वा शक्या विज्ञातुम्‌।-महाभाष्य
उपर्युक्त कथन में तीन महत्त्वपूर्ण बातों का उल्लेख है-
(1) शब्द रचना (2) तीन पुस्त के पुरखों के अक्षरों का योग (3) तद्धितान्त नहीं होना चाहिए अर्थात्‌ विशेषणादि नहीं कृत्‌ प्रत्यान्त होना चाहिए।
विधि-विधान-गृह्य सूत्रों के सामान्य नियम के अनुसार नामकरण संस्कार शिशु के जन्म के पश्चात्‌ दसवें या बारहवें दिन सम्पन्न करना चाहिए -
         द्वादशाहे  दशाहे वा जन्मतोऽपि त्रयोदशे।
         षोडशैकोनविंशे वा द्वात्रिंशे वर्षतः क्रमात्‌॥
संक्रान्ति, ग्रहण, और श्राद्धकाल में संस्कार मंगलमय नहीं माना जाता। गणेशार्चन करके संक्षिप्त व्याहृतियों से हवन सम्पन्न कराकर कांस्य पात्रा में चावल फैलाकर पांच पीपल के पत्तों पर पांच नामों का उल्लेख करते हुए उनका पञ्चोपचार पूजन करे। पुनः माता की गोद में पूर्वाभिमुख बालक के दक्षिण कर्ण में घर के बड़े पुरुष द्वारा पूजित नामों में से निर्धारित नाम सुनावे। हे शिशो! तव नाम अमुक शर्म-वर्म गुप्त दासाद्यस्ति'' आशीर्वचन देने के लिए निम्न ऋचाओं का पाठ करें-
''क्क वेदोऽसि येन त्वं देव वेद देवेभ्यो वेदो भवस्तेन मह्यां वेदो भूयाः। क्क अङ्‌गादङ्‌गात्संभवसि हृदयादधिजायते आत्मा वै पुत्रनामासि सद्द्रजीव शरदः शतम्‌'
  गोदान-छाया दान आदि कराया जाय। लोकाचार के अनुसार अन्य आचार सम्पादित किये जायें।
बालिकाओं के नामकरण के लिए तद्धितान्त नामकरणकी विधि है। बालिकाओं के नाम विषमाक्षर में किये जायें और वे आकारान्त या ईकारान्त हों। उच्चारण में सुखकर, सरल, मनोहर मङ्‌गलसूचक आशीर्वादात्मक होने चाहिए।
      स्त्रीणां च सुखमक्रूरं विस्पष्टार्थं मनोहरम्‌।
      मंगल्यं  दीर्घवर्णान्तमाशीर्वादाभिधानवत्‌। - वी.मि.
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जातकर्म


बाल्यावस्था के संस्कार - जातकर्म


 जातक के जन्मग्रहण के पश्चात्‌ पिता पुत्र मुख का दर्शन करे और तत्पश्चात्‌ नान्दी श्राद्धावसान जातकर्म विधि को सम्पन्न करे-

            जातं कुमारं स्वं दृष्ट्‌वा स्नात्वाऽनीय गुरुम्‌ पिता।
            नान्दी  श्राद्धावसाने   तु  जातकर्म   समाचरेत्‌

विधि-पिता स्वर्णशलाका या अपनी चौथी अंगुली से जातक को जीभ पर  मधु और घृत महाव्याहृतियों के उच्चारण के साथ चटावे। गायत्री मन्त्र के साथ ही घृत बिन्दु छोड़ा जाय। आयुर्वेद के ग्रंथों में जातकर्म-विधि का विधान चर्चित है कि पिता बच्चे के कान में दीर्घायुष्य मंत्रों का जाप करे। इस अवसर पर लग्नपत्रा बनाने और जातक के ग्रह नक्षत्रा की स्थिति की जानकारी भी प्राप्त करने की प्रथा है और तदनुसार बच्चे के भावी संस्कारों को भी निश्चित किया जाता है।
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सीमन्तोन्नयन


गर्भ का तृतीय संस्कार सीमतोन्नयन था। इस संस्कार में गर्भिणी स्त्री के केशों (सीमन्त) को ऊपर करना
 सीमन्त उन्नीयते यस्मिन्‌ कर्मणि तत्‌ सीमन्तोन्नयनम्‌-वी.मि.

विधि-किसी पुरुष नक्षत्रा में चन्द्रमा के स्थित होने पर स्त्री-पुरुष को उस दिन फलाहार करके इस विधि को सम्पन्न किया जाता है। गणेशार्चन, नान्दी, प्राजापत्य आहुति देना चाहिए। पत्नी अग्नि के पश्चिम आसन पर आसीन होती है और पति गूलरके कच्चे फलों का गुच्छ, कुशा, साही के कांटे लेकर उससे पत्नी के केश संवारता है -महाव्याहृतियों का उच्चारण करते हुए।

अयभूर्ज्ज स्वतो वृक्ष ऊर्ज्ज्वेव फलिनी भव - पा.गृ. सूत्र

इस अवसर पर मंगल गान, ब्राह्मण भोजन आदि कराने की प्रथा थी।

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पुंसवन संस्कार

गर्भधारण का निश्चय हो जाने के पश्चात्‌ शिशु को पुंसवन नामक संस्कार के द्वारा अभिषिक्त किया जाता था। इसका अभिप्राय-पुं-पुमान्‌ (पुरुष) का सवन (जन्म हो)।
      पुमान्‌ प्रसूयते येन कर्मणा तत्‌ पुंसवनमीरितम्‌ - बीरमित्रोदय
गर्भधारण का निश्चय हो जाने के तीसरे मास से चतुर्थ मास तक इस संस्कार का विधान बताया जाता है। अधिकांश स्मृतिकारों ने तीसरा माह ही गृहीत किया है।
                 तृतीये मासि कर्तव्यं गृष्टेरन्यत्रा शोभनम्‌।
                 गृष्टे  चतुर्थमासे तु षष्ठे मासेऽथवाष्टये। -वीरमित्रोदय
यह संस्कार चन्द्रमा के पुरुष नक्षत्रा में स्थित होने पर करना चाहिए। सामान्य गणेशार्चनादि करने के बाद गर्भिणी स्त्राी की नासिका के दाहिने छिद्र मे गर्भ-पोषण संरक्षण के लिए लक्ष्मणा, बटशुङ्‌ग, सहदेवी आदि औषधियों का रस छोड़ना चाहिए। सुश्रत नें सूत्र स्थान में कहा है-
''सुलक्ष्मणा-वटशुङ्‌रग, सहदेवी विश्वदेवानाभिमन्यतमम्‌ क्षीरेणाभिद्युष्टय त्रिचतुरो वा विन्दून दद्यात्‌ दक्षिणे-नासापुटे''-सुश्रत संहिता।
उपर्युक्त प्रक्रिया से जाहिर है कि इस संस्कार में वैज्ञानिक विधि का आश्रय है जिससे शिशु की पूर्णता प्राप्त हो और सर्वाङ्‌ग रक्षा हो।
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गर्भाधान संस्कार

गर्भाधान जन्म से पूर्व के संस्कार

   गृह्य सूत्र गर्भाधान के साथ ही संस्कारों का प्रारंभ करते हैं क्योंकि जीवन का प्रारम्भ इसी संस्कार से शुरू होता है -निषिक्तो यत्प्रयोगेण गर्भः संधार्यते स्त्रिया।
      तद्‌
गर्भालम्भनंनाम कर्म प्रोक्तं मनीषिभिः। वीर मित्रोदय।

  स्त्री-पुरुष के संयोग रूप इस संस्कार की विस्तृत विवेचना शास्त्रों में मिलती है जिसमें अनेक विधि-निषेधों की चर्चा है जो मानव जीवन के लिए और आगे आने वाले संतति परम्परा की शुद्धि के लिए अत्यावश्यक है। दिव्य सन्तति की प्राप्ति के लिए बताये गये शास्त्रीय प्रयोग सफल होते हैं सन्तति-निग्रह भी होता है।
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संस्कार

        संस्कार शब्द सम्‌ पूर्वक कृ‌-धातु से घञ्‌ प्रत्यय करके निष्पन्न होता है। संस्कार शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया जाता है। संस्कृत वाङ्‌मय में इसका प्रयोग शिक्षा, संस्कृति, प्रशिक्षण, सौजन्य पूर्णता, व्याकरण संबंधी शुद्धि, संस्करण, परिष्करण, शोभा आभूषण, प्रभाव, स्वरूप, स्वभाव, क्रिया, फलशक्ति, शुद्धि क्रिया, धार्मिक विधि विधान, अभिषेक, विचार भावना, धारणा, कार्य का परिणाम, क्रिया की विशेषता आदि व्यापक अर्थों में किया जाता है। अतः संस्कार शब्द अपने विशिष्ट अर्थ समूह को व्यक्त करता  और उक्त सम्पूर्ण अर्थ इस शब्द में समाहित हो गये हैं। अतः संस्कार, शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक शुद्धि के लिए किये जाने वाले अनुष्ठानों का श्रेष्ठ आचार है। इस अनुष्ठान प्रक्रिया से मनुष्य की बाह्याभ्यन्तर शुद्धि होती है जिससे वह समाज का श्रेष्ठ आचारवान्‌ नागरिक बन सके।
 हिन्दू संस्कारों में अनेक वैचारिक और धार्मिक विधियां सन्निविष्ट कर दी गयी हैं जिससे बाह्य परिष्कार के साथ ही व्यक्ति में सदाचार की पूर्णता का भी विकास हो सके। सविधि संस्कारों के अनुष्ठान से संस्कृत व्यक्ति में विलक्षण तथा अवर्णनीय गुणों का प्रादुर्भाव हो जाता हैङ्क
  आत्मशरीरान्यतरनिष्ठो विहित क्रियाजन्योऽतिशय विशेषः संस्कारः
                                             वीर मित्रोदय पृ. 191
कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च  म. स्मृ. 2/26
संस्कारों की संख्या-
संस्कारों के शास्त्राीय प्रयोग के सम्बन्ध में गृह्यसूत्रों को ही प्रमाण माना गया है। प्राचीन गृह्य सूत्रों में पारस्कर गृह्य सूत्र, अश्वलायन गृह्य सूत्र,बोधायन गृह्य सूत्र विशेष रूप से प्रामाणिक रूप से संस्कारों के अनुष्ठानों का विवरण, महत्त्व और मंत्राों का विवरण प्रस्तुत करते हैं। इनके अतिरिक्त पुराण सहित्य और विभिन्न स्मृतियां भी संस्कारों के आचार के संबंध तथा उनके महत्त्व का प्रतिपादन करती हैं। धर्म सूत्रों और धर्मशास्त्राों में भी इनके समन्वित रूपों का प्रतिपादन किया गया है। विभिन्न गृह्यसूत्रों एवं स्मृतियों में संस्कारों की संखया में मतैक्य नहीं हैं तदपि परवर्ती काल में संस्कारों की संखया का निर्धारण कर दिया गया। इन संस्कारों में जन्मपूर्व सलेकर बाल्यकाल के 10 संस्कार और शेष 6 शैक्षणिक तथा अन्त्येष्टि पर्यन्त के संस्कार परिगणित हैं
1. गर्भाधान            2.  पुंसवन
3. सीमन्तोन्नयन       4.  जात कर्म   
5. नामकरण           6.  निष्क्रमण
7. अन्नप्राशन          8.  चूड़ाकरण
9. कर्णवेध             10. विद्यारम्भ
11. उपनयन            12. वेदारंभ
13. केशान्त             14. समावर्तन
15.     विवाह 16.   अन्त्येष्टि
  कालक्रमानुसार प्राप्तभेद से अनुष्ठान पद्धतियों की रचना हो गई है। श्री दयानन्द सरस्वती के अनुयायियों एवं अन्य मतावलम्बियों ने भी अपने सम्प्रदायानुसार पद्धतियां बना ली हैं किन्तु देशज प्रक्रिया में भिन्नता रहते हुए भी शास्त्राीय विधि और मंत्रा प्रयोग यथावत्मिलते हैं। अनेक संस्कार काल वाह्य भी हो गये हैं तदपि उनकी कौल परम्परा अभी जीवित है। अतः इन संस्कारों का संक्षिप्त रूप से विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है। हिन्दू संस्कारों के समय मुहूर्त निर्धारण में ज्योतिष की भी मुखय भूमिका रहती है अतः प्रत्येक संस्कार के लिए नक्षत्रा योग के अनुसार ज्योतिष शास्त्र में मुहूर्तों का निर्धारण कर दिया है प्रचलित पञ्चाङ्‌गों में चक्रानुक्रम से उसका विवरण उपलब्ध रहता है। ज्योतिष के संक्षिप्त संकलन ग्रंथ भी इसमें सहायक हैं। संस्कारों के मुहूर्तों से सम्बन्धित सारिणी भी संलग्न कर दी जा रही है जिसमें संक्षेप में मुहूर्तों का विवरण है। मनु ने 'जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद्‌द्विज उच्यते' कहकर संस्कार की महत्ता का प्रतिपादन कर दिया है। संस्कार से ही द्विजत्व प्राप्त होता है। इसी वाक्य को आधार मानकर आर्य समाज के अधिष्ठाता स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सम्पूर्ण आर्य जाति को संस्कार से द्विजत्व प्राप्ति का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। षोडश संस्कारों के सबंध में संक्षिप्त परिचय, शास्त्रीय विधान का विवरण दिया जा रहा है। विशेष विवरण विभिन्न पद्धतियों से जानना चाहिये।
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मेघदूत का रामगिरि कहाँ ?

फेसबुक पर एक मित्र का निवेदन है-
                  sir! can u speak me about ramagiri of meghadutta?
साथ ही यह भी पूछा
            where is it? and what is ur view?
प्रश्नोत्तर के रुप में यह लेख उपस्थित है-
         मेघदूत में यक्ष मेघ को रामगिरि से अलकापुरी तक जाने के लिए सविस्तार मार्ग बताता है। मार्ग में कौन-कौन से पर्वत पड़ेंगे, जिन पर कुछ क्षण के लिए मेघ को विश्राम करना है, किन नदियों से मेघ को थोड़ा जल ग्रहण करना है और कौन-कौन से ग्राम अथवा नगर पड़ेंगे, जहाँ बरसा कर उसे शीतलता प्रदान करना है, इन सबका उल्लेख करता है।
 मेघ का मार्ग-
          उज्जयिनी, विदिशा, दशपुर आदि नगरों, ब्रह्मावर्त, कनखल आदि तीर्थों तथा वेत्रवती, गम्भीरा आदि नदियों को पार कर हिमालय और उस पर बसी अलका नगरी तक मेघ का मार्ग है।

 1- मल्लिनाथ तथा चरित्रवर्द्धन चित्रकूट को रामगिरि मानते हैं ।
2- हीरालाल शुक्ल आन्ध्रप्रदेश राज्य के खम्मम जिले में रामगिरि को मानते है।
3-पार्जीटर छत्तीसगढ के मैदान को रामगिरि मानते हैं ।
4- श्री मिराशी नागपुर के पास रामटेक को ही रामगिरि मानते हैं ।
मेघदूत में वर्णित रामगिरि पर्वत आधुनिक नागपुर में स्थित माना जाता है।  मेरे विचार से मेघदूत में जो स्थिति दी हुई, उससे वह नागपुर ही के पास होना चाहिए
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