अभिनवगुप्त और उनकी कृतियाँ

     जब-जब भारत में कश्मीर की चर्चा होगी, परम माहेश्वर शैवाचार्य अभिनवगुप्त का नाम स्मृति में अंकित रहेगा। वे कश्मीरी शैव दर्शन के महान् विद्वान् और तंत्र साहित्य के प्रणेता थे। उनके जीवन और वंश पर प्रकाश डालते हुए यहाँ उनके जन्म, पारिवारिक पृष्ठभूमि, और नामकरण का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है, जो उनके तन्त्रालोक ग्रंथ से लिया गया है।
  

जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

अभिनवगुप्त का जन्म कश्मीर में हुआ, जहाँ उनके पिता का नाम नरसिंहगुप्त और माता का नाम विमलकला था। उनके वंश की उत्पत्ति उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध नगर कन्नौज से हुई, जो गंगा और यमुना के मध्यभूमि में स्थित अन्तर्वेदी क्षेत्र के नाम से विख्यात था। उनके पूर्वज अत्रिगुप्त का जन्म लगभग 530-540 ईस्वी के आसपास कन्नौज के राजा यशोवर्मन (730-740 ईस्वी) के राज्य से लगभग 200 वर्ष पूर्व हुआ था। तत्कालीन कश्मीर नरेश ललितादित्य, जो विद्या प्रेमी थे, ने अत्रिगुप्त को सम्मानपूर्वक कश्मीर में आमंत्रित किया। इस घटना का उल्लेख तन्त्रालोक के आह्निक 37, श्लोक 39 में इस प्रकार है:

तमथ ललितादित्यो राजा निजं पुरमानयत्।
प्रणयरभसात् कश्मीराख्यो हिमालयमूर्धगम्।। तन्त्रालोक, आह्निक 37 श्लोक 39
इसके बाद अभिनवगुप्त ने अपने वंश वर्णन करते हुए कहते हैं कि इनके वंश में वराहगुप्त पैदा हुए । वराहगुप्त अभिनवगुप्त के पितामह तथा नरसिंहगुप्त पिता थे।
       तस्यान्वये महति कोऽपि वराहगुप्तनामा बभूव भगवान् स्वयमन्तकाले ।
       गीर्वाणसिन्धुलहरीकलिताग्रमूर्धा यस्याकरोत् परमनुग्रहमाग्रहेण।। तन्त्रालोक, आह्निक 37 श्लोक 53
       
      तस्यात्मजश्चुखलकेति जने प्रसिद्धश्चन्द्रावदातधिषणो नरसिंहगुप्तः ।
      यं सर्वशास्त्ररसमज्जनशुभ्रचित्तं माहेश्वरी परमलंकुरुते स्म भक्तिः।। तन्त्र.,आ.37, श्लोक53।।

निवास और साहित्यिक योगदान

अभिनवगुप्त का घर श्रीनगर में वितस्ता नदी के तट पर स्थित था, जहाँ उन्होंने अपने प्रमुख ग्रंथ तन्त्रालोक की रचना की। इस ग्रंथ में उन्होंने अपनी जीवनी, वंश, और शैव दर्शन का विस्तृत वर्णन किया है, जिससे उनके जीवन और सम्बन्धियों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है। तन्त्रालोक उनके तंत्र साहित्य का शिखर माना जाता है, जिसमें उन्होंने कश्मीर शैव दर्शन के सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया।

नामकरण

काव्यप्रकाश के टीकाकार वामाचार्य ने अपनी बालबोधिनी में अभिनवगुप्त के नामकरण का रोचक उल्लेख किया है। उन्होंने सुझाव दिया कि अध्यापकों को बालकों के लिए "अभिनवगुप्त" नाम रखना चाहिए, जो उनके गहन ज्ञान और नवीन दृष्टिकोण को दर्शाता है। वामाचार्य लिखते हैं: - इदमत्र रहस्यं पुरा किल क्वचिद्वलभो पठतां बहूनां ब्राह्मणबालकानां----- तन्नाम अभिनवगोपानसीगुप्तपाद इति वेदग्ध्यमुखेनाभिव्यनक्ति।
अभिनवगुप्त तथा इनकी रचनाओं का समय
अभिनवगुप्त ने अपने तीन पुस्तक क्रम स्तोत्र, भैरव स्तोत्र तथा ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृत्ति विमर्शिनी में इन ग्रन्थों के रचनाकाल का उल्लेख किया है। तदनुसार इनका समय 950 ई. से लेकर 1025 तक माना जा सकता है।
षट्षष्टिनामके वर्षे नवभयामसितेऽहनि।
मयाभिनवगुप्तेन मार्गशीर्षे स्तुतः शिवः।। क्रम स्तोत्र
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृत्ति विमर्शिनी के अनुसार इस पुस्तक का रचनाकाल 4115 सम्वत्सर बीत जाने पर मार्गशीष के अंत में 90 सम्वत्सर में हुआ।
इति नवतितमेऽस्मिन् वत्सरान्ये युगांशे,
तिथिशशिजलधिस्थे मार्गशीर्षावसाने।
जगति विहितबोधां ईश्वरप्रत्यभिज्ञां
व्यवृणुत परिपूर्णा प्रेरितः शम्भुपादैः।।
अभिनवगुप्त ने राजा यशस्कर के मंत्री पुत्र कर्ण को तंत्र सिद्धांतों को समझने के लिए मालिनी विजयवार्तिक की रचना किया था। इसमें उन्होंने  कर्ण और भद्र को सत्शिष्य के रूप में सम्बोधित किया है। तन्त्र सिद्धान्त को समझने के लिए कर्ण और भद्र को युवा होना चाहिए। यशस्कर की मृत्यु 948 ई. में हुई थी। क्षेमेन्द्र ने बृहत्कथा मंजरी और भारत मंजरी में लिखा है कि साहित्य का अध्ययन उन्होंने अभिनवगुप्त से किया था। क्षेमेन्द्र ने समयमातृका की रचना 1050 ईस्वी में तथा दशावतारचरित की रचना 1066 ई. में की थी, अतः इनकी साहित्य रचना का समय 1030 से 1060 समझा जाना चाहिए। अभिनवगुप्त इनसे निकट पूर्व में हुए थे। इस दशा में उनकी साहित्य रचना का समय 900 ईस्वी से 1010 ईस्वी माना जाना चाहिए। इस कालखण्ड में इनका जीवन शैव भक्ति तथा साहित्य साधना में व्यतीत हुआ। लोकश्रुति के अनुसार मगन नामक स्थान की विश्रुत भैरव गुफा में इन्होंने समाधि ली । 
विद्यार्जन
अभिनवगुप्त ने उस विषय के आधिकारिक विद्वानों से विद्या अर्जित किया था। इनके अलग-अलग शास्त्रों के अलग-अलग गुरु थे। कश्मीर से निकलकर वे जालन्धर भी गये तथा शम्भुनाथ से कौल शास्त्र की शिक्षा प्राप्त की।  इन्होंने अपनी कृतियों में बडे ही सम्मान के साथ अपने गुरुओं का उल्लेख किया है, जिनके विवरण निम्नानुसार हैं-
1.    व्याकरण शास्त्र के गुरु - नरसिंह गुप्त
नरसिंह गुप्त अभिनवगुप्त के पिता थे। इनका दूसरा नाम चुलुखक था।
2.    ध्वनि सिद्धांत के गुरु - भट्ट इंदुराज
ध्वन्यालोक की लोचन टीका के आरम्भ में अभिनवगुप्त ने अपना नाम लेकर स्मरण किया।
भट्टेन्दुराजचरणाब्जकृताधिवासहृद्यश्रुतोभिनवगुप्तपादाभिधोहम्।  
3.    द्वैतवादी शैव सम्प्रदाय के गुरु- भूतिराज तनय
वाक्यपदीय के टीकाकार हेलाराज ने अपना नाम भूतिराज तनय हेलाराज का उल्लेख अनेकवार किया है। सम्भव है कि ये वही भूतिराज तनय हों।
नाट्यशास्त्र के गुरु- भट्टतौत
इस प्रकार अभिनवगुप्त अनेक शास्त्रों के निष्णात विद्वान थे। अलंकार, न्याय, वैशेषिक, वेदांत, शैव, तंत्र, आदि शास्त्रों के सिद्धांतों का इन्होंने अपने अनेक गुरुओं से अध्ययन किया था। अपने ईश्वर प्रत्यभिज्ञा विवृत्ति विमर्शनी में लिखा है कि उन्होंने  नानागुरुप्रवरपादनिपात-जात संवत्सरीरुहविकासनिवेशित- श्रीः। अनेक गुरुओं के चरणों में बैठकर विद्या प्राप्त की।
अभिनवगुप्त की कृतियां
आचार्य अभिनवगुप्त ने अपने गुरुओं का अनुसरण करते हुए अनेक साहित्यों का प्रणयन किया। इन्होंने प्रत्यभिज्ञा दर्शन और त्रिक संप्रदाय की स्थापना की थी। मूल रूप से अभिनवगुप्त दार्शनिक थे परंतु साहित्य शास्त्र पर भी इनका असाधारण अधिकार था।
अभिनव गुप्त की साहित्यिक एवं दार्शनिक विचारों से संबंधित ग्रंथ बहुतायत में प्राप्त होते हैं।  इन्होंने कुल 44 ग्रंथों की रचना की थी, जिसमें से बहुत सारी रचनाएं अब नष्ट हो गई है। तंत्रालोक से लेकर भैरव स्थल जैसे छोटे ग्रंथ को को चार भागों में बांटा जा सकता है।
1.    काव्यशास्त्रीय कृतियां
2.    स्तोत्र
3.    तंत्र
4.    प्रत्यभिज्ञा दर्शन
आचार्य मम्मट अभिनवगुप्त के गुरु थे, जिसे सरस्वती का अवतार कहा जाता है। इनकी लोचन टीका संस्कृत क्षेत्र में अत्यंत ही महत्वपूर्ण स्थान रखती है इन्हें दुनिया लोग के एक-एक आकार के रूप में ही नहीं अपितु ध्वनि संप्रदाय के संस्थापक एवं प्रवर्तक के रुप में देखा जाता है यह आनंदवर्धन के समकालीन थे आचार्य अभिनवगुप्त आलोचना शास्त्र के इतिहास में गौरव में स्थान रखते हैं इनके द्वारा प्रदर्शित मार्ग पर चलते हुए भारत में आलोचना विषयक चिंतन प्रादुर्भूत हुआ यह अभिनव गुप्त कश्मीर के सेव आचार्य में अनन्यतम थे तथा प्रत्यभिज्ञा दर्शन के मौलिक आचार्य होने के कारण परम महेश्वर आचार्य पदवी से विभूषित किए जाते हैं। यद्यपि अभिनवगुप्त ने स्वतंत्र रुप से किसी काव्यशास्त्र ग्रंथ की रचना नहीं की फिर भी इन्होंने काव्यशास्त्र पर महत्वपूर्ण ग्रंथों टीकाएं लिखी है जिनके विवरण निम्नवत् हैं-
ध्वन्यालोक लोचन
आनंदवर्धन कृत ध्वन्यालोक पर अभिनवगुप्त की लोचन टीका प्राप्त होती है। इसे सहृदय लोक लोचन, काव्यालोक लोचन और ध्वन्यालोक लोचन नाम दिया जाता है। इसी टीका के कारण साहित्यकार इन्हें लोचनकार नाम से भी पुकारते हैं। काव्यशास्त्र के क्षेत्र में इस टीका का अतिशय महत्व है। इसमें ध्वनि और रस निष्पत्ति के तथ्यों की विशेष विवेचना की गई है तथा ध्वनिविरोधी मतों का दृढ़तापूर्वक खंडन किया गया है। अभिनव गुप्त ने अपने इस टीका में अपने से पूर्ववर्ती टीकाकारों के मतों को भी उद्धृत किया है।
          किं लोचनं विना लोके भाति चंद्रिकया  हि।
         तेनाभिनवगुप्तोयं लोचननोन्मीलनं व्यधात्।।
ध्वन्यालोक लोचन पर भी एक टीका कोल के विद्वान् उदयोतुग ने लिखी थी, जिसे कौमुदी नाम से जाना जाता है।
अभिनवभारती
भरत के नाट्यशास्त्र पर अभिनव भारती नामक टीका प्राप्त होती है। इसका दूसरा नाम नाट्यवेद विवृत्ति भी है। नाट्यशास्त्र पर प्राचीन काल में अनेक टीकाएं लिखी गई, परंतु आज केवल यही टीका उपलब्ध है। नाट्यशास्त्र के विषयों की जानकारी के लिए यह टीका अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। इसमें प्राचीन भारत की नाट्यकला (अभिनय,नृत्य संगीत) आदि विषयों की जानकारी बहुत ही गहराई से दी हुई है। देखा जाए तो अभिनव गुप्त द्वारा नाट्यशास्त्र पर लिखा गया यह एक स्वतंत्र और मौलिक रचना की भांति है, परंतु दुर्भाग्य है कि यह टीका पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं है।
काव्यकौतुक विवरण
इस ग्रंथ के रचनाकार अभिनवगुप्त के गुरु भट्टतोत हैं। अभिनवगुप्त ने इस पर विवरण नामक टीका लिखी है। आज यह ग्रंथ और टीका दोनों उपलब्ध नहीं होते हैं। अभिनव भारती तथा ध्वन्यालोक लोचन में कहीं-कहीं उसके उद्धरण प्राप्त होते हैं।
2. स्तोत्र
आचार्य अभिनवगुप्त ने अनेक स्तोत्र ग्रंथों की रचना की। इनमें कुछ स्तोत्र बड़े हैं तथा कुछ छोटे हैं। भैरवस्तवकर्म स्तोत्र आदि वृहदाकार में है और बोधपंचाशिका आदि छोटे आकार के हैं। उनके द्वारा रचित स्तोत्रों के विवरण निम्नानुसार हैं-
देवी स्तोत्र विवरण शिव शक्ति बिना भाव स्तोत्र प्रकरण स्तोत्र इत्यादि
क्रमस्तोत्र
त्रिक विद्या की प्रशंसा में लिखा गया यह ग्रंथ है।
भैरवस्तोत्र
शिव की दार्शनिक स्तुति की गई है, जो कि कश्मीर में बहुत ही प्रसिद्ध है।
देहस्थदेवताचक्र स्तोत्र
अनुभवनिवेदन स्तोत्र
क्रमकेलि
यह ग्रंथ  अनुपलब्ध है।
मालिनी तंत्र पर पूर्वपंञ्चिका अनुपलब्ध है।
अनुत्तराष्टिका स्तोत्र
3 तंत्र
आचार्य अभिनव गुप्त की कृतियों में एक भाग तंत्रों से संबंधित है इनका तंत्रालोक अत्यंत ही प्रसिद्ध ग्रंथ है। मालनी विजय भारती परात ऋषि का विवरण तथा तंत्रालोक सार भी तंत्र ग्रंथ हैं।
तंत्रालोक
अभिनव गुप्त की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृति तंत्रालोक है। यह अनेक प्रकाशकों के द्वारा अनेक खंडों में प्रकाशित किया जा चुका है। इसमें कुल, तंत्र, क्रम तथा प्रत्यभिज्ञा आदि सभी विचारधारा के समस्त पक्षों का विस्तारपूर्वक व्याख्या प्रस्तुत है। इसमें कर्मकांड और दर्शन दोनों का व्यवस्थित विवेचन किया गया है। शैव दर्शन का यह सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। चंद्रलोक पर जयरथ ने विवेक नामक टीका लिखी है। आज इस पुस्तक पर अनेकों टीकाएं प्राप्त होती है। इसमें कुल चौदह आह्निक और 30059 श्लोक हैं।
तंत्रसार
यह तंत्रालोक की शिक्षाओं का गद्यात्मक सारांश ग्रंथ है।
मालिनीविजयवार्तिक
यह ग्रन्थ परमार्थ विद्या और दर्शन के बहुत सारे रहस्यपूर्ण विषयों पर प्रकाश डालता है। त्रिक संप्रदाय का गहन ग्रंथ है। इस पर अभी तक कोई भी टीका उपलब्ध नहीं हो सकी है।
परात्रिंशिकाविवरण
यह एक आगम का ग्रंथ है, जिस पर मातृका मालिनी और कश्मीर शैवदर्शन के दूसरे रहस्यपूर्ण और गुढ व्यावहारिक सिद्धांतों पर प्रकाश डाला गया है।
5.प्रत्यभिज्ञा दर्शन
शिवदृष्ट्यालोचन
यह शिव दृष्टि पुस्तक पर लिखी गई टीका है, परंतु यह अभी उपलब्ध नहीं होती।
आचार्य अभिनवगुप्त ने प्रत्यभिज्ञा दर्शन विवाद वित्त से संबंधित की भी रचना की इस दर्शन पर मूल रूप से कार्यक्रम और व्यक्ति की रचना उत्पल गुप्त ने किया था जोकि अभिनवगुप्त के दादागुरु थे अर्थात अभिनवगुप्त के गुरु लक्ष्मण गुप्त तथा उनके गुरु उत्पल गुप्त थे कार्य का ग्रंथ का नाम ईश्वर प्रत्यभिज्ञा और व्यक्ति का नाम ईश्वर प्रत्यभिज्ञा निवृत्ति है इस पर अभिनवगुप्त में विस्तृत टीका लिखी है जो कि ईश्वर प्रत्यभिज्ञा विवर्त यूनिवर्सिटी के नाम से प्राप्त होती है अभिनवगुप्त ने प्रतिज्ञा दर्शन पर दो विमर्श में लिखी है इनमें से एक प्रत्यभिज्ञा विमर्श नी है जिसे लघु वृत्ति भी कहा जाता है तथा दूसरी गाड़ी का वृद्धि पर विमर्श नी प्राप्त होती है जो कि ईश्वर प्रत्यभिज्ञा व्यक्ति विमर्श नी है है इस ग्रंथ के अंत में अभिनव गुप्ता ने लिखा है कि भगवान शिव के उस मार्ग को सरल और सार्वजनिक सुलभ बनाया है जिसे गुरुओं ने निरूपित किया जो इस मार्ग का अनुसरण करता है वह पूर्ण हो कर शिव रूप हो जाता है।

अभिनवगुप्त, कश्मीर शैव दर्शन के महान् आचार्य, ने अपने गहन ज्ञान और दार्शनिक दृष्टिकोण के आधार पर अनेक ग्रंथों की रचना की, जो शैव सिद्धांतों, तंत्र, और वेदान्त को समृद्ध करते हैं। नीचे उनकी कतिपय अन्य कृतियों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत है:

 

1. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी

यह ग्रंथ अभिनवगुप्त की गहन दार्शनिक चिंतन का परिणाम है, जो ईश्वर की प्रत्यभिज्ञा (आत्म-प्रकाशन) के सिद्धांत पर आधारित है। इसमें कश्मीर शैव दर्शन के मूल तत्वों—चेतना, स्वतंत्रता, और ईश्वर की सर्वव्यापकता—का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। यह कार्य उनके गुरुओं की शिक्षाओं और उनके स्वयं के अनुभवों का संश्लेषण प्रस्तुत करता है।

 

2. परमार्थसार

परमार्थसार एक संक्षिप्त परंतु गहन ग्रंथ है, जो शैव दर्शन के मूल सिद्धांतों को सरल भाषा में व्यक्त करता है। इसमें छह अध्यायों में राजकीय योग और राजनीति के पहलुओं का भी उल्लेख है, जो शैव दर्शन को व्यावहारिक जीवन से जोड़ता है। यह ग्रंथ आत्मा और परमार्थ की प्राप्ति के मार्ग को प्रकाशित करता है।

 

3. परमार्थचर्चा

यह ग्रंथ शैवाद्वैत दर्शन का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जिसमें अभिनवगुप्त ने अद्वैत सिद्धांत को शैव परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया है। इसमें ईश्वर और जीव की एकता, और भौतिक जगत की माया के पार जाकर सत्य की खोज पर जोर दिया गया है, जो कश्मीर शैव दर्शन की मूल भावना को दर्शाता है।

 

4. बोधपञ्चदशिका

बोधपञ्चदशिका कश्मीरी शैव दर्शन का एक संक्षिप्त परंतु प्रभावशाली ग्रंथ है। इसमें अभिनवगुप्त ने 15 श्लोकों के माध्यम से शैव सिद्धांतों—चेतना की सर्वोच्चता, आत्म-प्रकाशन, और मोक्ष का मार्ग को संक्षेप में प्रस्तुत किया है। यह ग्रंथ प्रारंभिक शिक्षार्थियों और दार्शनिकों दोनों के लिए उपयोगी है।

 

5. गीतार्थसंग्रह

गीतार्थसंग्रह अभिनवगुप्त का भगवद्गीता पर लिखा गया एक महत्वपूर्ण भाष्य है, जिसमें उन्होंने गीता के श्लोकों का शैव दृष्टिकोण से व्याख्या की है। इस ग्रंथ की शिक्षा उन्हें उनके गुरु भट्टेन्दु राज से प्राप्त हुई थी। इसमें कर्म, भक्ति, और ज्ञान के योग को शैव चेतना के साथ जोड़ा गया है, जो उनकी दार्शनिक गहराई को दर्शाता है।
 इस लेख से यदि आपको थोडी भी सहायता मिलती है तो मैं अपना लेखन सार्थक समझूँगा।यथासमय इस लेख को और विस्तृत करने का प्रयास करुँगा। अभी बस इतना हीं।
आपका स्नेही ब्लागर
जगदानन्द झा, लखनऊ
Share:

विभक्ति-ज्ञानाय श्लोकाः

प्रथमा विभक्तेः पद्यानि
सन्तोषः परमो लाभः सत्सङ्गः परमा गतिः ।
विचारः परमं ज्ञानं शमो हि परमं सुखम् ।। योग वाशिष्ठ

मुखं पद्मदलाकारं वाणी चन्दनशीतला ।
हृदयं क्रोधसंयुक्तं त्रिविधं धूर्तलक्षणम् ।।

धनिनोपि निरुन्‍मादा युवानोपि न चंचलाः।
प्रभवोप्यप्रमत्‍तास्‍ते महामहिमशालिन: ।।

अर्थागमो नित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च ।
वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन् ।।

कुग्रामवासः कुनरस्य सेवा कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या।
मुर्खश्च पुत्रो विधवा च कन्या षड्जीवलोकस्य दुःखानि राजन्।।

अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते ।
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः ।।

अधमा धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमा:।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्।।

मातेव रक्षति पितेव हिते नियुङ्क्ते
कान्तेव चाभिरमयत्यपनीय खेदम्।
कीर्तिं च दिक्षु वितनोति तनोति लक्ष्मीं
किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या।।

केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः
न स्नानं न विलोपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः।
वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्।।

मही रम्या शय्या विपुलमुपधानं भुजलता
वितानश्चाकाशो व्यजनमनुकूलोऽयमनिलः ।
स्फुरद्दीपश्चन्द्रो विरतिवनितासंगमुदितः
सुखी शान्तः शेते विगतभवभीतिर्नृप इव ।।

सत्यानृता च पुरूषा प्रियवादिनी च
हिंस्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या।
नित्याव्यया प्रचुरनित्यधनागमा च

वाराङ्गनेव नृपनीतिरनेकरूपा।।
Share:

संस्कृत शिक्षा के प्रसार में सोशल मीडिया का योगदान

वास्तविक दुनिया के इतर आभासी दुनिया का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक हो चला है। वास्तविक जीवन में जहाँ हमारे मित्रों की संख्या जहाँ 100 के आसपास होती है, वही आभासी दुनियां में यह संख्या हजारों तक पहुँच जाती है। समान विचारधारा के लोग अन्तर्जाल या अन्य संसाधनों के माध्यम से आपस में जहाँ जुडते हैं, उसे सामाजिक नेटवर्किंग साइट कहा जाता है। अन्तर्जाल के माध्यम से हम यूट्यूब पर चलचित्र अपलोड करते हैं। संदेश सेवा के लिए वाट्सअप का उपयोग तथा फेसबुक, ट्विटर के माध्यम से विचारों का आदान प्रदान करते हैं। साहित्यिक, सामाजिक, धार्मिक एवं शैक्षणिक अभिरुचि के लोग ब्लाग लेखन करते हैं। इन्हें ब्लागर कहा जाता है। भारत में चुनाव प्रबन्धन एवं प्रचार में भी इसका उपयोग किया जाता है।  यहाँ हम बेरोकटोक अपनी बात कहते हैं। यहाँ लिखी बातें आसानी से सभी तक पहुँच जाती है। आज के युग में यह सूचना प्राप्ति और प्रसार का सशक्त माध्यम है। इसकी खामी इतनी भर है कि इसपर उपलब्ध सूचना पूर्णतः विश्वसनीय नहीं होती।  आपको जबतक सूचना निर्माता और प्रदाता के बारे सही जानकारी नहीं हो सूचना को अन्तिम सत्य मानना भूल होगी। नव प्रवेशियों एवं किशोरों को यह समय बर्वाद करने का अंतहीन अवसर देता है। फिर भी यह संसाधन उतना बुरा भी नहीं है, जितना कि कुछ लोग इसे समझते हैं। वास्तविक दुनिया की तरह ही सोशल मीडिया का उपयोगकर्ता कोई अच्छा गुरु यदि आपको मिल जाय तो इसके गुणों का आप भरपूर लाभ ले सकते हैं। हमें इस बात पर गर्व है कि संस्कृत प्रेमियों ने लोगों को संस्कृत सिखाने के लिए विना किसी प्रकार का पारिश्रमिक लिये भरपूर सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर अपने जीवन का बडा भाग लगा दिया है, ताकि हम संस्कृत सीख सकें। कई लोग इसका उपयोग पत्रकारिता के लिए करते हैं तो कई लोग विज्ञापन के द्वारा उत्पाद बेचने के लिए। यहाँ हर आयु ,वर्ग,  लिंग आदि के लिए सामग्री उपलब्ध है। फेसबुक को भारत में  सर्वाधिक लोग पसन्द करते हैं।
         सोशल नेटवर्किंग साइट या सोशल मिडिया का उपयोग शिक्षा के क्षेत्र में भी किया जाता है। इस लेख में फेसबुक,ट्विटर, यूट्यूब तथा ब्लाग के माध्यम से संस्कृत शिक्षा के प्रचार प्रसार की दिशा में किये जा रहे कार्यों की एकत्र जानकारी दी जाएगी। सभी के लिंक भी दिये जा रहे हैं, ताकि उसपर चटका लगाकर सम्बन्धित सामग्री तक सीधे पहुँचा जा सके। 
   फेसबुक 
     संस्कृत से जुडा हर युवा सोशल मिडिया पर है। चाहे वह महिला हो या पुरुष। वे किसी न किसी ग्रुप से जुडे हैं। कुछ लोग यहाँ अपना स्वतंत्र पेज निर्मित किये हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय से शोध कर रही संस्कृत छात्रा  कु. पूजा जायसवाल से मैंने पूछा। क्या तुम संस्कृत शिक्षा के लिए फेसबुक का उपयोग करती हो? उसने कहा कि मैं  Sanskrit Sahitya Parishat  नामक ग्रुप से जुडी हूँ। यहाँ पर संस्कृत साहित्य से सम्बन्धित अच्छी जानकारी मिलती है।  संस्कृत शिक्षा के प्रसार, जिज्ञासा पूर्ति, शोध तथा अध्ययन  आदि अलग अलग उद्येश्यों के साथ लगभग 200 ग्रुप से अधिक ग्रुप संचालित हैं। कुछ ग्रुप बच्चों में संस्कृत के प्रसार के उद्येश्य से भी निर्मित हैं यथा-  शिशु-संस्कृतम्  । प्रत्येक ग्रुप का अलग-अलग उद्येश्य हैं। इस कार्य के लिए किसी ने ग्रुप निर्माता के लिए आदेश जारी नहीं किया। यहाँ एक स्वस्थ कार्य संस्कृति दिखती है। लोग स्वेच्छा से अपना ज्ञान बांटने में लगे हैं। हिन्दी के कई मेरे फेसबुक मित्र अपनी पूरी रचनायें पाठकों के लिए उपलब्ध कराते हैं। वे नियमित अंतराल पर पाठकों के लिए अपनी कविता, कहानी या समीक्षा प्रकाशित करते हैं। ऐसे प्रिय लेखकों के पोस्ट को पढने के लिए लोग प्रतीक्षा करते हैं। संस्कृत में उस परम्परा का अभाव दिखता है। Arvind Kumar Tiwary जैसे  संस्कृत के स्थापित युवा कुछ लेखकों  को छोडकर शेष लेखक अपनी पूरी रचनायें पाठकों के लिए उपलव्ध नहीं कराते। यह आवश्यक नहीं कि संस्कृत कवि सम्मेलन सुनने के लिए आप किसी कार्यक्रम स्थल तक जायें। जागरूक मित्र फेसबुक लाइब के माध्यम से हमें घर बैठे ही वह सुविधा दे देते है।मैं कई अवसरों पर संस्कृत का श्लोक या कोई उद्धरण खोजता हूँ। कुछ सामग्री सिर्फ फेसबुक पर ही मिल पाती है। सोशल मीडिया दो तरह के लोगों से चलता है। 1- विषय सामग्री निर्माता 2- सामग्री के वाहक। निश्चित रुप से इनमें सामग्री निर्माता श्रेष्ठ है। कुछ लोग यहाँ शैक्षिक सामग्री का निर्माण करते हैं।  प्रो.मदन मोहन झा जैसे लोग  संस्कृत सिखाने के लिए अनेक प्रकार के चार्ट, व्यंग चित्र आदि का निर्माण करते हैं। मैं फेसबुक पर संस्कृत से जुडे विभिन्न मुद्दों को उठाता हूँ। अपने चिंतन को जनता के समक्ष विचार के लिए प्रस्तुत करता हूँ। कुछ मित्र संस्कृत का वाक्याभ्यास कराने में जुटे रहते हैं। आवश्यकता है, ऐसे मित्रों को पहचान कर मित्रता करने की। संस्कृत प्रेमी मित्र को पहचानने का सरल तरीका यह है कि आप उसके टाइमलाइन पर लगे चित्र को देखें, यदि वह संस्कृत से जुडा कोई चित्र लगाया है, तब उसे संस्कृत प्रेमी समझना चाहिए। मेरे अनेक मित्र संस्कृत से जुडी बौद्धिक सम्पदा को विभिन्न संचार प्रविधि के माध्यम से प्रचारित करते हैं। फेसबुक ग्रुप को निम्नलिखित 9 श्रेणी में बांटा जा सकता है। 
1- संस्कृत भाषा सिखाने के उद्येश्य से।
2- विभिन्न संस्कृत विश्वविद्यालयों / संस्थाओं /  संस्कृत विभागों का समूह।
3- प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए।
4- संस्कृत पत्र पत्रिकाओं के प्रचार के लिए।
5-  शास्त्रीय चर्चा के लिए।
6- संस्कृत द्वारा मनोरंजन पाने के लिए।
7- संस्कृत क्षेत्र से जुडी सभी प्रकार की सूचना उपलब्ध कराने के लिए।
8- संस्कृत में लिखी जा रही नयी रचनाओं के लिए।
9- संस्कृत शिक्षण के लिए।
          यहाँ पर संक्षेप में मैं कुछ ग्रुप का परिचय दूँगा ताकि आप इसका लाभ ले सकें। मैं भी फेसबुक पर कुछ ग्रुप का प्रबन्धन करता हूँ। विभाजित ग्रुप का विवरण अधोलिखित है-
           संस्कृत भाषा सिखाने के उद्येश्य से निर्मित  ग्रुप                                                           
1- संस्कृतं भारतम् SANSKRITAM BHARATAM     इसके 01 लाख सदस्य हैं। इसका  उद्येश्य  संस्कृत शिक्षा
 का प्रसार करना है। यहाँ पर उसी पोस्ट को प्रसारित किया जाता है, जो संस्कृत शिक्षा के लिए उपयोगी हो।  इस ग्रुप के प्रबन्धक -  प्रो.मदन मोहन झा एवं जगदानन्द झा   हैं।
2- || आओ संस्कृत सीखे ||  इसके 23.5 हजार सदस्य हैं। इसका  उद्येश्य  संस्कृत भाषा सिखाना है। यहाँ पर उसी पोस्ट को प्रसारित किया जाता है, जो संस्कृत शिक्षा के लिए उपयोगी हो।  इस ग्रुप के प्रबन्धक -  राजकुमार गुप्ता   हैं। इन्होंने अपने साथ 4 अन्य प्रबन्धक को  जोडा है। इसकी लोकप्रियता में गिरावट आयी है।
3- सरलसंस्कृतशिक्षणम् इसके 19.8 हजार सदस्य हैं तथा पांच प्रबन्धकों द्वारा संचालित है।
4 - LEARN SANSKRIT   इसके 05 हजार सदस्य हैं। इसके Admin Dr-Praful Purohit हैं।

संस्कृत पत्र पत्रिकाओं के प्रचार के लिए निर्मित ग्रुप का लिंक नीचे दिया गया है।

 विभिन्न संस्कृत विश्वविद्यालयों / संस्थाओं /  संस्कृत विभागों का समूह।

प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए।

शास्त्रीय चर्चा के लिए।
1-   Sanskrit Sahitya Parishat

संस्कृत द्वारा मनोरंजन पाने के लिए।

संस्कृत क्षेत्र से जुडी सभी प्रकार की सूचना उपलब्ध कराने के लिए।

संस्कृत में लिखने वाले रचनाकारों का ग्रुप  

शैक्षणिक ग्रुप
उपर्युक्त समूह में से कुछ समूह पर निरंतर पाठ्यसामग्री प्राप्त होते रहती है। सामग्री की गुणवत्ता प्रबन्धक पर निर्भर है। एक व्यक्ति एक से अधिक ग्रुप का प्रबन्धन करते हैं। ग्रुप की अच्छाई यह है कि कोई भी प्रबन्धक सीधे आपको अपने समूह में जोड सकता है। ग्रुप से जुडने के लिए आपको प्रबन्धक से अनुमति लेनी पड सकती है।  लोगों को पेज से जुडने के लिए प्रबन्धक को आमंत्रण भेजना होता है, क्योकि पेज व्यक्तिगत होता है। आप स्वयं भी किसी Page को Like कर सकते हैं। पेज को Like करने के लिए मित्रों को आमंत्रित कर सकते हैं। यहाँ Event नामक सुविधा है जिससे अपने मित्रों को  जानकारी एवं आमंत्रण भेज सकते हैं।  मैंने संस्कृतसर्जना त्रैमासिकी ई-पत्रिका के प्रचार- प्रसार के लिए sanskritsarjana नामक ग्रुप बनाया है। पत्रिका का लिंक है- http://sanskritsarjana.in/  संस्कृत के नये रचनाकारों को यह समूह समेकित मंच उपलब्ध कराता है।
         फेसबुक के अनेक पेज के माध्यम से भी संस्कृत का प्रचार एवं शिक्षण के कार्य किये जा रहे हैं। कई लोग अपने टाइमलाइन पर संस्कृत से जुडे मुद्दे की ही चर्चा करते हैं। वे संस्कृत के सामाजिक सरोकारों से जुडे होते हैं। उनसे मित्रता पाने से अनेक प्रकार के लाभ होते हैं। वे सभी प्रकार की सूचना भी उपलब्ध कराते हैं।


 संस्कृत के लिए निर्मित फेसबुक पर महत्वपूर्ण पेज


1- प्राची प्रज्ञा अन्तर्जालपत्रिका
2- संस्कृत - बालसंवाद:
3- Jagdanand Jha                      1574 लोगों ने Like किया है तथा 1900 Follows हैं।
4- Sanskritjagat
5- Learn The Easy Way Sanskrit
6- Mukta swadhyaya Peetham (Institute of Distance Education )
7- संस्कृतशिक्षणम् लाइव - प्रसारणम्
8- Sanskrit Newspaper Sajal Sandesh - News Paper in Sanskrit Language
9- Sanskrit Wikipedia
10- Sanskrit Sarjana E-Magazine           3,018  Like तथा 3106 Follows हैं।
11-  Universal Sanskrit Shlokas & Subhashitas
12- Sanskrit Daily Newspaper
13- Samskrita Baalasahitya Parishad
14- संस्कृतं जनभाषा स्यात्
15- Computational Linguistics at Depa
16- Shodh Navneet
17- गुरुकुल प्रभात आश्रम
18- Sanskritsarjana              इसे 2,124 लोगों ने Like किया है तथा 2,109 Follows हैं।
19- Jahnavi Sanskrit E-Journal
20- करंट अफेयर्स & सामान्य ज्ञान एवम रोचक 
21- श्रीनाट्यम् The group of sanskrit drama

फेसबुक पर इस प्रकार के अनेक पेज निर्मित हैं। प्रत्येक पेज श्रेणीबद्ध होता है। आप अपनी जरुरत के अनुसार Like कर दें। इससे आपको समय -समय पर नये पोस्ट की सूचनायें मिलती रहेगी।

वाट्सअप
            भारत में संदेश सेवा तथा समूह से जुडने के लिए वाट्सअप को बहुत पसन्द किया जाता है। इसका संचालन बहुत ही आसान है। एक समूह (ग्रुप) में आप अधिकतम 250 लोगों को जोड़ सकते हैं। फेसबुक के मैसेंजर सेवा की ही तरह आप आडियो, विडियो तथा फाइल भेज सकते हैं। फेसबुक और इसमें अन्तर यही है कि यह एक संदेश सेवा है, जबकि ट्विटर, ब्लाग और फेसबुक एक साइट। ट्विटर, ब्लाग और फेसबुक पर की सामग्री को आप वर्षों बाद भी पा सकते हैं। सर्च इंजन द्वारा इस सामग्री को खोजा जा सकता है परन्तु गोपनीयता नीति के कारण वाट्सअप की सामग्री को खोजा नहीं जा सकता। संस्कृत प्रचारक सभी के लिए खुले तौर पर लिखते हैं, परन्तु जो लोग फेसबुक का प्रयोग नहीं करते, उनतक संस्कृत से जुडी सामग्री पहुँचाने के लिए वाट्सअप का भी प्रयोग करते है। यहाँ समूह का नाम दिये जाने का कोई लाभ नहीं है। जबतक आपका कोई परिचित मित्र किसी समूह का प्रबन्धक नहीं हो, तबतक आप सीधे समूह से जुड नहीं सकते। ग्रुप प्रबन्धक के पास यदि आपका फोन नं. है तब वह आपको आपसे विना पूछे भी जोड सकता है। आप अन्य सोशल मीडिया पर अपना दूरभाष संख्या देकर समूह से जोडने का अनुरोध कर सकते हैं। 

यूट्यूब चैनल

संस्कृत के उच्चारण एवं भाषा शिक्षण में यूट्यूब सशक्त माध्यम है। किसी भी बेवसाइट से इसे जोडा जा सकता है। पाठ्यक्रम शिक्षण के लिए एक अध्यापक यहाँ अपना एकाउन्ट बना सकते हैं। अपने चैनल पर पाठ्यक्रम का विडियो अपलोड कर सकते हैं। संस्कृत भाषा से सम्बन्धित यूट्यूब चैनल को 8 श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।
1. शास्त्रशिक्षण परक या विशिष्ट व्याख्यान परक
2. संस्कृतभाषा शिक्षण
Spoken Sanskrit Series (कोलंबिया यूनिवर्सिटी के छात्र अभिनव सीतारमण ने एक अनोखी पहल)
Learn The Easy Way Sanskrit (सरलसंस्कृतशिक्षणम्)


3. संस्कृत कवि सम्मेलन, स्तोत्र पाठ तथा वेद पाठ,
 4. संस्कृत गीत, नाटक या मनोरंजन
5. प्रतियोगी परीक्षा तैयारी कराने वाला
6. हायर सेकेंड्री तक के पाठ्यक्रमों के लिए
SANSKRIT CLASS MADE EASY (Aradhna Srivastava, a Sanskrit  teacher, Started this channel in October 2018)
Dr. Vasudev Prasad (learn Sanskrit  K-12 education through Videos as per CBSE, ICSE and NCERT syllabi for Sanskrit)
7. पत्रकारिता से सम्बन्धित
8. आध्यात्मिक

आदि के विडियो यहाँ प्रचूर मात्रा में उपलब्ध है, जिससे आप आंशिक रूप से संस्कृत सीख सकते हैं। जनसामान्य को बोलचाल का संस्कृत सिखाने से लेकर साहित्य,व्याकरण, दर्शन आदि विविध शास्त्रों की शिक्षा देने के लिए यहाँ पर विडियो उपलब्ध हो जाते हैं। यहाँ मैं कुछ शैक्षिक विडियो का लिंक दे रहा हूँ। 
 
  इस लिंक पर वर्णोच्चारण से लेकर लेखन नियम, व्याकरण, प्रहेलिका, सूक्ति आदि के लगभग 240 विडियो हैं।
इस लिंक पर संस्कृत के विविध विषयों पर विद्वानों के व्याख्यान, संस्कृत गीत आदि के लगभग 150 विडियो हैं।
संस्कृतसर्जना  पत्रिका के इस लिंक पर अनेक शैक्षिक विडियो के लिंक का संग्रह किया गया है।
3- Quick way to Learn Sanskrit Online
 यहाँ पर CBSC बोर्ड में चलने वाले संस्कृत व्याकरण का विडियो उपलब्ध हैं। Ces Ugc का कार्यक्रम learn sanskrit be modern पर संस्कृत सिखाया जाता है। यहाँ डॉ. बलदेवानन्द सागर का शिक्षणात्मक व्याख्यान सुनने को मिलता है। श्रृंखला का नाम है संस्कृतं पठ आधुनिको भव। 

ब्लॉग
        संस्कृत के कई शुभेक्षु गूगल की सेवा ब्लाग पर संस्कृत विषय पर नियमित लेखन करते हैं। यहाँ उनकी संस्कृत रचनायें,निबन्ध तथा अन्य सामग्री प्राप्त होती है।  गूगल,worldpress पर अपना ब्लाग बनाया जा सकता है। आप मेरा यह संस्कृतभाषी ब्लाग पढ ही रहे हैं। इसमें मैंने विषय विभाजन के लिए लेबल की सुविधा ही है। कई पेज अलग से निर्मित हैं। आपके लिए यह निःशुल्क सेवा है। कुछ ब्लाग का विवरण निम्नानुसार हैं- 

भाषा शिक्षण के लिए कुछ महत्वपूर्ण अन्य लिंक
1- Special Center for Sanskrit Studies 
2. संस्कृत ई बुक्स

संस्कृतविकिपीडिया ।  इसकी सह परियोजनायें हैं-

 

विकिस्रोत, विकिसूक्ति, विकिशब्दकोश, विकिमीडिया, मेटाविकि, विकिकामन्स्

  गूगल ग्रुप


Share:

अनुवाद सुविधा

Pages

ब्लॉग की सामग्री यहाँ खोजें।

लोकप्रिय पोस्ट

© संस्कृतभाषी | जगदानन्द झा. Blogger द्वारा संचालित.

मास्तु प्रतिलिपिः

इस ब्लॉग के बारे में

संस्कृतभाषी ब्लॉग में मुख्यतः मेरा
वैचारिक लेख, कर्मकाण्ड,ज्योतिष, आयुर्वेद, विधि, विद्वानों की जीवनी, 15 हजार संस्कृत पुस्तकों, 4 हजार पाण्डुलिपियों के नाम, उ.प्र. के संस्कृत विद्यालयों, महाविद्यालयों आदि के नाम व पता, संस्कृत गीत
आदि विषयों पर सामग्री उपलब्ध हैं। आप लेवल में जाकर इच्छित विषय का चयन करें। ब्लॉग की सामग्री खोजने के लिए खोज सुविधा का उपयोग करें

समर्थक एवं मित्र

सर्वाधिकार सुरक्षित

विषय श्रेणियाँ

ब्लॉग आर्काइव

Recent Posts

लेखानुक्रमणी

लेख सूचक पर क्लिक कर सामग्री खोजें

अभिनवगुप्त (1) अलंकार (3) आधुनिक संस्कृत गीत (19) आधुनिक संस्कृत साहित्य (5) आयुर्वेद (1) उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान (1) उत्तराखंड (1) ऋग्वेद (1) ऋषिका (1) कणाद (1) करवा चौथ (1) कर्मकाण्ड (50) कहानी (1) कामशास्त्र (1) कारक (1) काल (2) काव्य (23) काव्यशास्त्र (27) काव्यशास्त्रकार (1) किरातार्जुनीयम् (3) कुमाऊँ (1) कूर्मांचल (1) कृदन्त (3) कोजगरा (1) कोश (13) क्त्वा (1) गंगा (1) गया (1) गाय (1) गीति काव्य (2) गृह कीट (1) गोविन्दराज (1) ग्रह (1) छन्द (6) छात्रवृत्ति (1) जगदानन्द झा (3) जगन्नाथ (1) जीवनी (6) ज्योतिष (20) तकनीकि शिक्षा (21) तद्धित (11) तिङन्त (11) तिथि (1) तीर्थ (3) दर्शन (19) धन्वन्तरि (1) धर्म (1) धर्मशास्त्र (14) नक्षत्र (2) नाटक (4) नाट्यशास्त्र (3) नाथ पंथ (8) नायिका (2) नीति (3) न्याय शास्त्र (1) पतञ्जलि (3) पत्रकारिता (4) पत्रिका (6) पराङ्कुशाचार्य (2) पर्व (2) पाणिनीय पद-शिल्प (2) पाण्डुलिपि (2) पालि (3) पुरस्कार (13) पुराण (3) पुस्तक (1) पुस्तक संदर्शिका (1) पुस्तक सूची (14) पुस्तकालय (5) पूजा (1) प्रतियोगिता (7) प्रत्यभिज्ञा शास्त्र (1) प्रत्यय (1) प्रशस्तपाद (1) प्रहसन (1) प्रौद्योगिकी (1) बिल्हण (1) बौद्ध (6) बौद्ध दर्शन (3) ब्रह्मसूत्र (1) भरत (1) भर्तृहरि (2) भामह (1) भारतीय दर्शन (1) भाषा (3) भाषा प्रौद्योगिकी (1) भाष्य (1) भोज प्रबन्ध (1) मगध (3) मनु (1) मनोरोग (1) महाविद्यालय (1) महोत्सव (2) मुहूर्त (1) मेघदूतम् (1) योग (5) योग दिवस (2) रघुवंशम् (6) रचनाकार (3) रस (1) रामसेतु (1) रामानुजाचार्य (4) रामायण (4) रोजगार (2) रोमशा (1) लघुसिद्धान्तकौमुदी (46) लिपि (1) वर्गीकरण (1) वल्लभ (1) वाक्यशिल्पी (2) वाल्मीकि (1) विद्यालय (1) विधि (1) विश्वनाथ (1) विश्वविद्यालय (1) वृष्टि (1) वेद (6) वैचारिक निबन्ध (33) वैशेषिक (1) व्याकरण (53) व्यास (2) व्रत (2) शंकाराचार्य (2) शब्दकोश (3) शरद् (1) शैव दर्शन (2) श्लोक चक्र (1) श्लोकसंधानम् (3) श्लोकान्त्याक्षरी (4) संख्या (1) संचार (1) संस्कार (19) संस्कृत (16) संस्कृत आयोग (1) संस्कृत ऐप (5) संस्कृत कथा (11) संस्कृत गीतम्‌ (56) संस्कृत टूल्स (1) संस्कृत पत्रकारिता (2) संस्कृत प्रचार (2) संस्कृत लेखक (1) संस्कृत वाचन (1) संस्कृत विद्यालय (3) संस्कृत शिक्षा (6) संस्कृत सामान्य ज्ञान (1) संस्कृतसर्जना (5) सन्धि (3) समास (6) सम्मान (1) सामुद्रिक शास्त्र (1) साहित्य (8) साहित्यदर्पण (1) सुबन्त (6) सुभाषित (3) सूक्त (3) सूक्ति (1) सूचना (1) सोलर सिस्टम (1) सोशल मीडिया (2) स्तुति (2) स्तोत्र (11) स्मृति (12) स्वामि रङ्गरामानुजाचार्य (2) हास्य (1) हास्य काव्य (2) हुलासगंज (2) Devnagari script (2) Dharma (1) epic (1) jagdanand jha (1) JRF in Sanskrit (Code- 25) (3) Library (1) magazine (1) Mahabharata (1) Manuscriptology (2) Online Sanskrit Game (1) Pustak Sangdarshika (1) Sanskrit (2) Sanskrit Competition (1) Sanskrit language (1) sanskrit saptaha (1) sanskritsarjana (3) sex (1) Shlokantyakshari (2) Shlokasandhanam (1) Student Contest (2) UGC NET/ JRF (4)