प्राचीन भारतीय विधि एवं विधिकार

           सनातन भारतीय विधान में विधिशास्त्र धर्मशास्त्र पर आधारित है। प्राचीन भारत में धर्म और न्याय का मूल स्रोत वेद को माना गया है। मनुस्मृति में विधि के चार स्रोत माने गये है। 1. वेद वचन 2. स्मृति 3.परम्परा से चला आया हुआ शिष्टाचार 4. स्वंय को प्रिय लगने वाले कार्य।
                                     वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
                                    एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षात् धर्मस्य लक्षणम्।।
                        इस प्रकार प्राचीन भारतीय विधिकारों में सर्वप्रथम नाम आता है वेद का वेद अर्थात् ईशवर प्रदत्त विधि। तदनन्तर उनके वचनों को संसार में लाने वाले माध्यममनु याज्ञवल्क्य व्यास आदि की स्मृति का स्थान आता है।
                        वेदों के बाद मानव व्यवहार एवं दण्ड की व्यवस्था के लिए कल्पसूत्र की रचना की गयी। गृह्यसूत्र, श्रौतसूत्र, धर्मसूत्र तथा शुल्वसूत्र को कल्पसूत्र कहा जाता है। भारतीय विधि वेदों से आरम्भ कल्पसूत्र स्मृति, स्मृतियों के निबंध तथा टीका से माना जाता है। परवर्ती साहित्य में अर्थशास्त्र तथा नीतिशास्त्रों की रचना की गयी।
                        हिन्दू न्याय और विधि के इतिहास में पूर्वोक्त ग्रन्थों के ग्रन्थकारों को विधिकार कहा गया है।
                        याज्ञवल्क्य जिनका समय लगभग 6000 पू0 माना जाता है ने अपने स्मृति में विधिकार के रुप में 20 ऋषियों का नामोल्लेख किया है।
            धमसूत्रों के बाद मनु, याज्ञवल्क्य नारद, बृहस्पति, कात्यायन, पितामह, यम, हरित, अंगिरस, प्रजापति, संवर्त, दक्ष, पुलस्त्य, विश्वामित्र की स्मृतियों को विधि ग्रन्थ माना गया है। श्रुति और स्मृति में मतभेद होने पर श्रुतिमान्य होती है। याज्ञवल्क्य ने परम्पराओं और सामान्य न्याय पर जोर दिया है साक्षी आदि विषयों पर याज्ञवल्क्य ने अपनी परिभाषाएँ प्रस्तुत की।
भारत का सनातन धर्म राजा अथवा शासक के आदेश पर आधारित नही है। स्मृतिकारों ने कहा है धर्मो पारयते प्रजाः। राजा न्याय का निर्माता नहीं इसका पालक है। भारत में विधिनियमों के संग्रह को संहिता के अतिरिक्त, स्मृति नाम से सम्बोधित किया गया है। शास्त्र कारों के मत से अन्य सभी प्रकार के ज्ञान की भांति मनुष्य के कर्तव्याकर्तव्य के विधान का सोत्र श्रुति ही है। अतः विधि संहिताओं का आधार उन स्मृतिकारों की स्मरण शक्ति ही है। इसी आधार पर मनु के स्मृति का नाम मनुस्मृति प्रारम्भिक विधि संहिताएँ जिस रुप में हमें उपलब्ध है इससे स्पष्ट है कि वे तत्कालीन लोकरीतियों के संग्रह है। स्थानीय लोकरीतियांे में में एकरुपता हो सबको कर्तव्याकर्तव्य का ज्ञान उपलब्ध हो सके अतः मौखिक प्रचलित रुढि़ के स्थान पर लिपिबद्व विधिनियमों को लोक व्यवहार में लाया गया।
विनय पिटक- विनय पिटक भिक्षुसंघ का संविधान हैं। सारनाथ में भिक्षुसंघ की स्थापना। संघ की परिशुद्वि, संघटन संचालन के लिए विनय नियम बनाने लगे। समय-समय पर बने नियमांे के संकलन विनय पिटक में किया गया। तीन भाग- 1. उमतो विभंग (सुक्त विभंग) 2.खंघक 3.परिवार पूर्णिमा और अमावस्या के दिन संघ में इन नियमावलियों का पाठ होता है। सात प्रकार के विवादो का समाधान, शिष्टाचार के 75 नियम, असत्य भाषण के 92 नियम, चीवर-पात्र धारण के 30नियम, अनिश्चित परिस्थितियों के 2 नियम, किसी आपत्ति को प्राप्त भिक्षु के लिए 13 नियम, पराजय के कारणों पर 4 नियम सहित कुल 227 के उल्लेख है, जो भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए लागू होते है।
गिलगिट से प्राप्त बौद्व ग्रन्थों में भी विनय का कुछ अंश है इसका सम्पादन नलिवाक्ष दत्त ने किया
पराशर स्मृति
                        पराशर स्मृति कलियुग का स्मृति माना गया है। इसमें कलियुग के आचार, रीति, नियम की चर्चा की गयी है। अन्य स्मृतियों से प्रथक् इसकी महत्ता इसीलिए है कि समसामयिक कर्तव्याकर्तव्य का निर्णय इसमें प्रतिपादित है। यथा---
                                    आपत्काले तु सम्प्राप्ते शौचाचारं न चिन्तयेत्।
                                    स्वयं समुद्वरेत्पश्चात् स्वस्थो धर्म समाचरेत्।।
                        संकटापन्न स्थिति में व्यक्ति को शौच तथा आचार की संहिता न कर सर्वप्रथम स्वयं की रक्षा करनी चाहिए। स्वस्थ होने पर धर्म का आचरण करना चाहिए।
इसी प्रकार--                  देश भंग प्रवासे च व्याधिषु व्यसेनष्वपि।
                                   रक्षेदेव स्वदेहादौ पश्चाद्धर्म समाचोत्।।
देश पर आये संकट में, प्रवास में रोग ग्रस्त होने पर, अत्यधिक व्यस्तता में सर्वप्रथम अपने शरीर की रक्षा करें तदनन्तर धर्म का आचरण करना चाहिए। स्त्रियों के लिए उदारता इस स्मृति में देखी जाती है-
                                      नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतिते यतौ।
                                     पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते।।

पति के खो जाने, मरने, सन्यासी होने, नपुंसक होने, पतित होने, इन पाँच स्थितियों में नारी को दूसरी शादी कर लेनी चाहिए।
नारद- न्यायालय में न्याय की व्यवस्था कैसी हो विक्षद वर्णन नारद में देश के न्याय प्रशासन का वर्गीकरण कर उसे व्यवस्थित किया-यस्मिन् देशे य आचारः पारम्पर्य नारद ने। 3234 विभागों में विभाजित कर स्पष्ट किया।
बृहस्पति- न्याय प्रशासन तथा न्यायलय व्यवस्था का सविस्तार वर्णन। न्यायालय के अधिकारियों की संख्या 10 बताया नारद में 8 अमात्य तथा पुरोहित भी न्यायलय के अधिकारी थे। न्यायालय में प्रार्थना पत्र देने के बाद की कारवाइयों का उल्लेख दीवानी तथा फौजदारी न्याय व्यवस्था का अलग-अलग उल्लेख है।
     कुछ स्मृतियों का उल्लेख मिताक्षरा, स्मृति चन्द्रिका में प्राप्त होता निबंध तथा टीका ग्रन्थों में स्मृतियों की व्याख्या का प्रयास 9000 के बाद नवीन स्मृति की रचना नहीं की गयी। इसके बाद निबन्ध टीका ग्रन्थों में याज्ञवल्क्य स्मृति पर विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका रचना काल 11 वीं शताब्दी। जीमूत वाहन 13 वीं और 15 वीं शताब्दी के बीच दायभाग की रचना की इसमें सभी स्मृतियों के वचन सम्मिलित किये गये। दायभाग का कानून बंगाल में चलता है।
                        मितक्षरा के चार उपविभाग 1. वाराणसी में बीरमित्रोदय तथा निर्णय सिन्धु 2. मिथिला में विवाद चिन्ता विवाद रत्नाकर 3. द्रविड़ देश में स्मृति चन्द्रिका, पराशर माधव और वीर मित्रोदय 4. महाराष्ट्र में और गुजरात में व्यवहार मयूख, वीर मित्रोदय और निर्णय सिन्धु की मान्यता है। एक देश, काल में अनेक विधिकार इसकी सम्भावना क्रम विश्व सभी विधिकार अपनी समसामयिक परम्पराओं, न्यायाधीशों की व्यवस्थाओं और मान्य अधिनियमांे को ही विधियों का रुप प्रदान करते रहे है।

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चित्रकूट के प्रमुख दर्शनीय स्थल

                 चित्रकूट के महत्व का गुणगान आदि-कवि वाल्मीकि, पुराणों के रचयिता महर्षि व्यास, महाकवि कालिदास, संस्कृत नाटककार भवभूति, संतकवि तुलसी, मुसलमान कवि रहीम  ने मुक्त कण्ठ से किया है। मानवीय सृष्टि-सरणि में अवतारी पुरुष भगवान राम ने जिस स्थान को अपना निवास स्थान चुना हो और जिसकी प्रशंसा के भाव भरे गीत गायें हों उसके प्रभाव तथा माहात्म्य के बारे में कुछ कहना अशेष रह जाता है।

स्थान परिचयः- 

         चित्रकूट उत्तर प्रदेश के बांदा जिले की करवी तहसील तथा मध्यप्रदेश के सतना जिले की सीमा पर स्थित है। यह प्रयाग (इलाहाबाद) से 120 किलो-मीटर पश्चिम झाँसी-मानिकपुर (मध्य रेलवे) के बीच चित्रकूट-धाम-करवी रेलवे स्टेशन से 8 किलोमीटर दक्षिण है। सामान्यतया करवी, सीतापुर कामता, खोही तथा नयागाँव- से पाँच बस्तियाँ और इनका समीपवर्ती विस्तृत वनांचल चित्रकूटनाम से विख्यात है।

चित्रकूट पहुँचने का साधनः- 

           चित्रकूट पहुँचने के लिए रेल बसों की सेवाएँ उपलब्ध हैं। चित्रकूट-धाम-करवी झाँसी-मानिकपुर (मध्य रेलवे) का स्टेशन है। इनके अतिरिक्त इलाहाबाद-जबलपुर मार्ग पर चलने वाली अन्य रेलगाडि़यो से यात्रा करने वाले यात्रियों को मानिकपुर जंक्शन पर उतरना पड़ता है। वहाँ से चित्रकूटधाम-करवी के लिए कोई रेलगाड़ी अथवा बस पकड़नी पड़ती है। मानिकपुर से चित्रकूटधाम-करवी की दूरी लगभग 25 किलोमीटर है। रेलों के अलावा आज कल तो बसोंका प्रचलन इतना अधिक हो गया है कि चाहे जिधर से चित्रकूट आना हो, सभी तरफ से बसें चित्रकूट के लिए मिल जाती है। प्रयाग से दिन भर घण्टे-घण्टे बाद रोडवेज की बसें आती रहती हैं। सतना से चित्रकूट का मार्ग बन जाने से वहाँ से भी बसें चित्रकूट तक चलने लगी है। सागर से होती हुई बसें चित्रकूट पहुँचती है।

आवास की सुविधायेंः- 

        यात्रियों के ठहरने के लिए सीतापुर (चित्रकूट) में कई धर्मशालायें है, जिनमें कलकत्ता वाली धर्मशाला, माँजी की धर्मशाला, आगरा वालों की धर्मशाला, तुमसर धर्मशाला, श्रीराम धर्मशाला तथा राठी की कोठी धर्मशाला अधिक प्रसिद्व है। इधर चित्रकूट में अनेक जातीय धर्मशालायें बन गयी है अतः वहाँ भी यात्रियांे को आवास की सुविधायें मिल जाती है। सीतापुर में चित्रकूटधाम नगरपालिका का यात्री-ग्रह तथा पयस्विनी के किनारे मध्यप्रदेश सरकार द्वारा निर्मित सार्वजनिक निर्माण विभाग-डाकबंगला और वन विभाग-डाकबंगला भी है। इनके अतिरिक्त चित्रकूट में सैकड़ों मठ व मन्दिर है, जहाँ यात्रियांे को निःशुल्क आवास की व्यवस्था कर दी जाती है। यहाँ पण्डे लोग भी पर्याप्त संख्या में रहते हैं, जो यात्रियों को हर सम्भव सुविधायें प्रदान करते है। हाल में यहाँ जयपुरिया भवनतथा पर्यटन विभाग का यात्रीगृहबन जाने से उन यात्रियों को भी सुविधा मिल गई है जो आधुनिक ढ़ग का आवास पसन्द करते है।

चित्रकूट के दर्शनीय स्थलः- 

         चित्रकूट एक आरण्यक तीर्थ है। हरी-भरी वन-श्रेणियों के बीच स्थान-स्थान पर यहाँ ऐसे दर्शनीय स्थल हैं, जो रमणीयता और पवित्रता के लिए युगों से सुविख्यात है। केवल धार्मिक महत्व वाले स्थानो की संख्या बहुत अधिक है, पर अध्यात्म, संस्कृति तथा पर्यटन-तीनों दृष्टियों से जो स्थान महत्वपूर्ण है, उन्ही का संक्षिप्त परिचय यहाँ दिया जा रहा है।
कामदगिरिः- चित्रकूट तीर्थ के मुख्य देव श्री कामदगिरिहै। इसकी प्राकृतिक सुषमा बड़ी ही निराली है। महर्षि वाल्मीकि, महाकवि कालिदास तथा संत कवि तुलसी ने बड़े ही प्रभावशाली शब्दों में इसका वर्णन किया है। इसके दर्शन एवं परिक्रमा करने से श्रद्धालु-यात्री के सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। इसीलिए इसका नाम कामदगिरिहै। इस गिरिराज का प्रभाव यों तो अनादिकाल से चला आ रहा है, पर भगवान राम के प्रवास करने से इसका महत्व और भी बढ़ गया है।
                 कामदगिरि के दर्शन के लिए प्रतिमास की अमावस्या, चैत्र रामनवमी और दीपमालिका को भारत के कोने-कोने से अंसख्य यात्री चित्रकूट आते हैं और इसकी परिक्रमा कर स्वयं को धन्य मानते है। पर्वत के चारों ओर परिक्रमा के लिए पक्का मार्ग बना हुआ है, जिसकी परिधि लगीाग 3 मील है। परिक्रमा के किनारे-किनारे सैकड़ों देवालय बने हुए हैं, जिनमें राममुहल्ला, मुखारविन्द, साखी गोपाल, भरत-मिलाप (चरण-पादुका) तथा पीली कोठी अधिक महत्वपूर्ण है।
          पर्वत के दक्षिण पाश्र्व में एक छोटी-सी पहाड़ी है, जिसे लक्ष्मण पहडि़याकहते हैं। इसके शिखर पर श्री लक्ष्मण जी का मन्दिर बना हुआ है। जन-श्रुति के अनुसार राम के वनवास-काल में लक्ष्मण जी का यही निवास स्थान था।
भरत-मिलाप (चरण-पादुका)ः- यह स्थान कामदगिरि के दक्षिण पाश्र्व में परिक्रमा पथ पर है। यह वही स्थान है, जहाँ भरत राम का अश्रुप्रवाही मिलन हुआ था। वह मिलन, जिसमें पर्वतराज की कठिन शिलायें भी पिघल कर पानी-पानी हो गयी थी, पक्षियांे का कलरव शान्त पड़ गया था और वन खण्ड की तरु-लतायें भी चार आँसू रो पड़ी थीं। जहाँ धर्म के समक्ष राजनीति ने मात्था टेका था और कर्तव्य ने वैभव को पैरों तले कुचल राज्य-पद को कुन्दक बना कर इधर-उधर फेंका था। पिघली हुई उन शिलाओं का चिहनावशेष आज भी उस अपूर्व मिलन की याद को ताजा कर देता है।
रामघाटः- चित्रकूट पर्वत से डेढ़ किलोमीटर पूर्व पयस्विनी (मंदाकिनी) नदी तट निर्मित रामधाट भक्तों एवं श्रद्धालुओं के लिए बड़ा ही पवित्र स्थान माना जाता है। यहाँ पर बैठ कर इधर-उधर दृष्टि डालने से वाराणसी में गंगा के घाटों का स्मरण हो आता है।                 
       रामघाट के ऊपर अनेक मन्दिर व मठ है, जिनमें श्री मत्तगयेन्द्र (मदगंजन स्वामी) शंकरजी का मन्दिर अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। मन्दिरों के इस समुदाय को पुरीकहते है। इसके चतुर्दिक परिक्रमा बनी हुई है। लोग श्रद्धा के साथ पुरी की भी परिक्रमा करते है।
प्रमोद वनः- रामधाट से एक किलोमीटर दक्षिण चित्रकूट-सतना रोड पर पयस्विनी तट यह स्थान स्थित है। इसमें रीवां नरेश का बनवाया हुआ श्री नारायण भगवान का मन्दिर है। इसके चारों ओर लगभग 300 कोठरियाँ बनी हुई है, जिनके सम्बन्ध में कहा जाता है कि रीवां नरेश ने किसी दैवी बाधा की शान्ति के लिए इनका निर्माण करा कर उतने ही पण्डितों द्वारा किसी विशेष अनुष्ठान का आयोजन किया था।
         प्रमोद वन के ठीक सामने पश्चिम में दास हनुमाननामक स्थान है, जो एक सिद्व जगह मानी जाती है।
जानकी कुण्डः- प्रमोद वन से एक फलाँग दक्षिण स्थित जानकी कुण्ड आज कल चित्रकूट का सर्वाधिक रम्य आश्रम समझा जाता है। यहाँ विरक्त महात्माओं की सैकडों गुफायें तथा कुटीरें है, जहाँ तीन-चार सौ महात्मा सदैव तपश्चर्या करते रहते है। इस आश्रम का प्राकृतिक दृश्य बहुत सुहावना है। नीचे मंदाकिनी छल-छल करती हुई बह रही है। इसके दोनों किनारे सघन वृक्षों की सुन्दर कतारें हैं, जो दर्शक का मन हठात् मोह लेती है। मंदाकिनी के जल में यहाँ अंसख्य दीर्घकाल मछलियाँ तैरती रहती है, जो कुछ क्षणों के लिए पर्यटकों के मनोरंजन का साधन बन जाती है।
          आश्रम में स्व0 संत श्री रणछोरदास जी महाराज द्वारा स्थापित एक संस्कृत पाठशाला तथा रघुवीर जी का भव्य मन्दिर है। यहाँ एक धर्मशाला तथा कई सुन्दर भजनाश्रम बने हुए है। स्वामी पंजाबी भगवान् द्वारा निर्मित श्री हनुमान जी का मन्दिर भी विशेष दर्शनीय है।
          प्रसिद्वि है कि वनवास काल में महारानी जानकी जी यहाँ नित्य स्नान करने आती थीं, इसीलिए इसका नाम जानकी कुण्डपड़ा।
स्फटिक शिलाः- यह स्थान जानकी कुण्ड से लगभग डेढ़ किलोमीटर दक्षिण सधन वृक्षावली से आवृत्त पयस्विनी के तट पर है। यह वही स्थान है जहाँ एक विशाल शिला-खण्ड पर भगवान राम के चरण-चिन्ह अंकित है। इसी शिला पर बैठी हुई भगवती सीता पर इन्द्र-पुत्र जयन्त ने काक का रुप धारण कर चच्चु प्रहार किया था। यहाँ का प्राकृतिक दृश्य अतीव आकर्षक, मनोमुग्धकारी और नेत्रानुरज्जनकारी है।
अनुसूया आश्रमः- जानकी कुण्ड से लगभग 15 किलोमीटर दक्षिण प्रकृति देवी की हरी-भरी गोद में अवस्थित महासती अनुसूया तथा महर्षि अत्रि जी की तपश्चर्या का पवित्र स्थल अनुसूया-आश्रमके नाम से विख्यात है। पुण्यशील दम्पति (अत्रि-अनुसूया) के प्रभाव से इसका कण-कण परम पवित्र तथा प्रेरणा स्त्रोत है। यह जन समूह के कोलाहल से दूर शान्ति  का आगार परम रमणीक आश्रम है। इस आश्रम की पुनीत शरण में अनेक महात्माओं ने परम सिद्वि प्राप्त की है। यहाँ अत्रि अनुसूया तथा उनके पुत्र भगवान दत्रात्रय, दुर्वासा और चन्द्रमा की मूर्तियाँ स्थापित है। प्राकृतिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक-तीनों दृष्टियों से यह स्थान महत्वपूर्ण है। यह वही स्थान है, जहाँ महासती अनुसूया ने महारानी सीता को पतिव्रत धर्मका दिव्य उपदेश देकर नारी-जाति का स्वर्ग प्रशस्त किया था।
          चित्रकूट-सतना रोड से फूट कर एक पक्का उपमार्ग यहाँ तक जाता है। इसे मध्य प्रदेश शासन द्वारा बनाया गया है। यहाँ एक सिद्व बाबा का बड़ा सुन्दर आश्रम बना है। नीचे अनुसूयाजी की तपस्या में लाई गयी पयस्विनी (मन्दाकिनी) नदी बह रही है।
          पर विचारणीय बात यह है कि इतने सुन्दर तथा रमणीक आश्रम में पर्यटकों के आवासादि के लिए न तो कोई धर्मशाला है, न सरकारी विश्राम-गृह ही। देश के धर्मशील सम्पन्न परिवारों तथा शासन को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
गुप्त गोदावरीः- यह तीर्थस्थल अनुसूया आश्रम से लगभग 6 किलोमीटर पश्चिम में है। एक लम्बी गुफा से निरन्तर जल स्त्राव होता रहता है। भीतर अँधेरा होने से यात्री दीपक (गैस) के प्रकाश में अन्दर प्रवेश करते है। इसके भीतर एक कुण्ड है, जिसे सीता कुण्ड कहते है जो दरवाजे से 15-16 गज की दूरी पर है। गुफा से पानी की धारा कुण्डों पर गिरती है और वही लृप्त हो जाती है, इसी से इसे गुप्त गोदावरी कहते है। यहाँ का प्राकृतिक कला-कौशल अद्भुत है। जलवाही गुफा के बगल में एक दूसरी विशाल गुफा है, जिसका ऊपरी भाग काफी ऊँचा है। छत पर एक ऐसा पत्थर लटका हुआ है जो हिलता रहता है। इसे लोग खटखटा चोरकहते है, जिसके पीछे अनेक किंवदन्तियाँ जुड़ी हुई है।
मड़फाः- गुप्त गोदावरी से 3-4 किलोमीटर दूर माण्डय ऋषि का परम प्राचीन आश्रम मड़फानाम से प्रसिद्व है। एक छोटी पहाड़ी पर ध्वंसावशेष मात्र एक अति प्राचीन किला है, जो कालिंजर दुर्ग का ही एक अंग बताया जाता है। यहाँ का पर्वतीय प्राकृतिक दृश्य बहुत ही चित्ताकर्षक है। भगवान श्री बाला जी का भव्य मन्दिर यहाँ बना है, पास में ही पंचमुखी शंकर जी की विशाल प्रतिमा भी स्थापित है। पहाड़ी से कई झरने झरते है तथा नीचे पाप-मोचननामक एक प्रसिद्व सरोवर है।
          यह आश्रम दुर्गम वनांचल में अवस्थित है, इसलिए यहाँ सुरक्षा की दृष्टि से यात्रियों को बड़ी सावधानी से जाना चहिए।
भरत कूपः- यह श्री कामदगिरि से आठ किलोमीटर पश्चिम तथा झाँसी-मानिकपुर रेलवे लाइन पर ऐतिहासिक कूप है, जिसमें भरत जी ने श्री रामचन्द्र जी के अभिषेकार्थ लाए हुए समस्त तीर्थों के जल को डाला था। इसलिए इसके जल में स्नान का बड़ा महत्व माना जाता है।
          कूप के पास ही भरत जी का मन्दिर है। भरत जी की स्मृति में एक संस्कृत पाठशाला भी चलाई जा रही है।
गणेश बागः- करवी से डेढ़ किलोमीटर दक्षिण में देश के प्राचीन गौरव तथा समृद्वि का प्रतीक-स्वरुप गणेश बाग पेशवा नरेशों की कीर्ति सँजोये खड़ा है। इसका निर्माण उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में श्रीमन्त विनायकराव पेशवा ने अपने आमोद-प्रमोद के लिए कराया था। यहाँ की इमारतों का निर्माण भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। बीच में प्राचीन शैली का भव्य षट्कोणी पंचमन्दिर है, जिसके ऊपरी भाग में भित्ति-प्रस्तरों की बारीक कटाई करके खजुराहोकी भाँति देवी-देवताओं की अंसख्य मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गयी है। सामने एक सरोवर है, जिससे इसकी शोभा और भी बढ़ गयी है। पश्चिमी भाग में एक बड़ा ही भव्य जलाशय है, जिसमें कूप और वापी का सुन्दर सम्मिश्रण है। यह तीन खण्डों का है और इसके दो खण्ड प्रायः पानी से भरे रहते है। गर्मियों में दूसरा खण्ड भी खुल जाता है। पर सरकार द्वारा विधनतः संरक्षित-इमारत घोषिट किये जाने के बावजूद सुरक्षा तथा मरम्मत के अभाव में भारतीय शिल्प मला का अद्भुत नमूना धीरे-धीरे धराशायी होता हुआ स्मृति-शेष ही रह जाता दीख रहा है।
बाँके सिद्धः- गणेश बाग से 3 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व हरे-भरे विन्ध्य पर्वत के पाश्र्व भाग में स्थित बाँके सिद्ध अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है।
          सचमुच यह देव निर्मित एक सुन्दर कन्दरा है। इसके निर्माण में भगवती प्रकृति देवी ने अपूर्व चातुर्य दिखाया है। एक विशाल चट्टान के नीचे विस्तृत कक्ष बना हुआ है, जो धरातल से सैकड़ों फीट नीचा है। गुफा तक पहुँचने के लिए नीचे से पक्की सीढि़याँ बनी हुई है। ऊपर से निर्मल जल वाला झरना गिर रहा है, जिसका दृश्य बड़ा ही मनोहर है। यह गुफा के उत्तरी भाग को नहलाता हुआ पर्वत के ही वक्ष में विलीन हो जाता है।
कोतितीर्थः- बाँके सिद्व से डेढ़ किलोमीटर दक्षिण इसी पर्वत पर कोटितीर्थनामक रम्य स्थान है। इसका प्राकृतिक दृश्य भी सिद्व की भांति ही है। यहाँ भी एक झरना बह रहा है, जो पर्वत में ही अन्तर्लीन हो जाता है। कहा जाता है कि जब भगवान राम चित्रकूट पधारे थे, तब उनके दर्शनार्थ देवलोक से आए हुए करोड़ों देवता इसी स्थान पर रुके थे। इसीलिए इसे कोतितीर्थकहते है।
देवड़गनाः- यह स्थान कोटितीर्थ से 2 किलोमीटर दक्षिण (करवी से 6 किलोमीटर दक्षिण अथवा रामघाट (चित्रकूट) से 3 मी पूर्व) कोटितीर्थ वाले पर्वत केक अच्चल में ही सुशोभित है। यहाँ का पर्वतीय दृश्य तथा जल प्रपात का उद्गम बाँके सिद्व एवे कोटितीर्थ के ही सामान है। प्रसिद्वि है कि राम के वनवास-काल में उनके दर्शनार्थ से आयी हुई विविध देवों की स्त्रियाँ इस स्थान पर रुकी थीं, इसलिए इसे देवड़गना कहते है।
हनुमान-धाराः- यह स्थान देवड़गना वाली पर्वत श्रंृखला पर ही (चित्रकूट) से तीन किलोमीटर पूर्व स्थित है। यहाँ श्री हनुमान जी की भव्य मूर्ति स्थापित है, जिनके दर्शन के लिए यों तो यात्री प्रतिदिन पहुँचते रहते है, पर भाद्रपद शुक्ल पक्ष के अन्तिम मंगलवार (बुढ़वा मंगल) को यहाँ प्रतिवर्ष बड़ा भारी मेला जगता है।
          पर्वत के भीतर से एक ऐसा झरना फूट निकला है, जिसकी शुण्डाकार निर्मल जलधारा श्री हनुमान जी की बायीं भुजा पर पड़ती है। इसे देखने से शंकर भगवान के मस्तक पर गंगावरण के दृश्य की कल्पना होने लगती है। मूर्ति के पास तक पहुँचने के लिए नीचे से 360 सीढि़याँ बनी हुई है। यात्रियों के विश्राम के लिए एक छोटी-सी धर्मशाला भी यहाँ है।
      इसी पर्वत श्रेणी में हनुमान-धारा के ऊपर सीता रसोईतथा नरसिंह-धारानामक स्थान भी दर्शनीय है।
          उल्लिखित स्थानों के अतिरिक्त चित्रकूटधाम में और भी कई दर्शनीय स्थल है। जानकी कुण्ड के मार्ग में रामघाटतथा दक्षिण सिरसावन’, परिक्रमा मार्ग में पीली कोठी तथा सैकड़ों अन्य मन्दिर, पीली कोठी से थोड़ी दूर राम शैया’, करवी से 6 किलोमीटर सूर्य कुण्डआदि पवित्र स्थान है, जो दर्शन करने योग्य है। चित्रकूट के दक्षिणी वनाच्चल में शरभंग आश्रम तथा सुतीक्षण आश्रम भी दर्शनीय है, पर ये स्थान बड़े दुर्गम है।
वाल्मीकि आश्रमः- करवी से 16 किलोमीटर पूर्व चित्रकूट-इलाहाबाद राजमार्ग पर आदि-कवि महर्षि वाल्मीकि जा का पावन आश्रम एक हरी-भरी पहाड़ी के शिखर पर स्थित है। पहाड़ी के नीचे वाल्मीकि नदी (ओहन नदी) बहती है। पहाड़ी के शिखर पर एक मन्दिर है, जिसमें महर्षि वाल्मीकि की प्रतिमा स्थापित है। इसके दक्षिण-पूर्व में पाश्र्व मार्ग में एक गुफा में अपेक प्रकार की प्राचीन मूतियाँ स्थापित है।
          पहाड़ी के शिखर के नीचे तल भाग से कुछ ऊपर प्रसिद्व असावर देवी (आशा मणि देवी) का मन्दिर है, जिनके दर्शनार्थ प्रति सोमवार को मेला लगता है। चैत्र राम नवमी को यहाँ बहुत बड़ा मेला लगता है, जो 4-5 दिन तक चलता है।वाल्मीकि-आश्रम वही स्थान है, जहाँ महर्षि वाल्मीकि ने वनवासी भगवान राम कोचित्रकूट में वास करने का परामर्श दिया था स्थान अत्यन्त रमणीक है।यहाँ एक संस्कृत पाठशाला भी स्थापित है।
ब्लाग लेखक- जगदानन्द झा, लखनऊ
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