वेदारंभ उपनयन संस्कार के बाद किया जाता है जो अब प्रतीकात्मक
ही रह गया है। वास्तव में यह संस्कार मुखय रूप से वेद की विभिन्न शाखाओं की रक्षा
के लिए उसके अभ्यास की परम्परा से जुड़ा है। अपनी कुल परम्परा के अनुसार वेद, शाखा सूत्र आदि के स्वाध्याय की पद्धति थी। जिसे अनिवार्य रूप से
द्विजातियों को उसका अभ्यास करना पड़ता था। कालान्तर में मात्रा पुरोहितों के कुलों में
सीमित हो गई और अब उसका प्रायः लोप हो गया है। यही कारण है कि वेद की बहुत सी
शाखायें उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि श्रुति परम्परा से ही इसकी रक्षा की जाती थी।
महर्षि पतञ्जलि ने भी महाभाष्य में इसकी चर्चा करते हुए कहा है कि अनेक शाखा-सूत्रों
का लोप हो गया है।
वर्तमान पद्धतियों में चतुर्वेदों के मंत्रों का संग्रह कर
दिया गया है जिसे उपनयन के बाद सावित्री-सरस्वती-लक्ष्मी गणेश की अर्चना के बाद
उपनीत बटु से उसका औपचारिक उच्चारण मात्र करा दिया जाता है। अतः अब यह संस्कार
उपनयन का अंगभूत भाग रह गया है।
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